Wednesday, November 25, 2009

सालगिरह

बरस आठ दो दशक से श्यामल, सुमन हैं साथ।
ईश कृपा से आजतक संग हाथ में हाथ।।

वह पल अब तक याद है बहुत मधुर अनमोल।
खुशी, कुतुहल, प्यार का भाव हृदय के बोल।।

गूँज गयी किलकारियाँ रजनी आयी द्वार।
जीवन के नव-अर्थ से और बढ़ा कुछ प्यार।।

गुजरे दिन कुछ और तो घर में रश्मि प्रवेश।
फिर चंचल का आगमन खुशियाँ मिलीं अशेष।।

स्नेह, समर्पण साथ में अब तक है सम्बन्ध।
मीठी किचकिच भी हुई ठोस हुआ अनुबन्ध।।

अब आपस में बात कम आँखों से संवाद।
सुमन तो मुझसे नेक है करती नहीं विवाद।।

नहीं पता मिल हम चलें कितने और वसंत।
लेकिन जब तक साथ हैं नहीं खुशी का अंत।।

Tuesday, November 24, 2009

मतलब

मतलब पर मत लव को खोल।
हो सकता है सब कुछ गोल।
मतलब पूरे तो मिठास संग,
लव खोलो, मत लब लब बोल।।

Tuesday, November 17, 2009

विकास की गंगा

देश के किसी भाग में चुनाव की घोषणा हुई कि नहीं विभिन्न राजनैतिक दलों की प्रचार गाड़ियों के कानफोड़ू स्पीकर से एक ही आवाज आती है हम "विकास की गंगा" बहा देंगे। हमारे झारखण्ड मे अभी चुनावी बुखार जोरेों पर है। यह दीगर बात है कि झारखणड सरकार की सुल्तानगंज से "उत्तरवाहिनी गंगा" को देवघर के "शिवगंगा" में नहर द्वारा मिलाने की बहुमुखी योजना बर्षों से फाइल के नीचे जस की तस पड़ी है। लेकिन यहाँ चुनावी विकास की गंगा अभी बह रही है।


जीवनदायिनी "भागीरथ की गंगा" को तो हम बचा ही नहीं पा रहे हैं और चले विकास की गंगा बहाने। बकौल राज कपूर "राम की गंगा" तो कब की मैली हो चुकी है इन पापियों के पाप धोते धोते। उसके बाद से गंगा की गन्दगी और बढ़ी है। किसे फिक्र है? लेकिन ये "जननायक" विकास की गंगा बहाये बिना थोड़े ही मानेंगे? क्योंकि इसी विकास की गंगा में तो लगातार हाथ धोने की तैयारी में प्रतीक्षारत हैं ये लोग।

हाँ गंगा नये नये रूपों में संशोधित और परिवर्द्धित होकर निकली है अपने देश में। भ्रष्टाचार की गंगा, घोटालों की गंगा, नक्सलवाद की गंगा आदि आदि। मजे की बात है कि ओरिजिनल गंगा सिकुड़ती जा रही है और शेष में निरन्तर विकास हो रहा है। शायद इसी को विकास की गंगा कहते हैं क्या?

विश्वास नहीं तो मधु कोड़ा जी के कारनामे को लीजिये। कमाल कर दिया उन्होंने। पूर्व के जितने भी घोटालेबाज हैं, सभी सकते में हैं कि "गुरू गुड़ और चेला चीनी"। हो भी क्यों नहीं जिस "कोड़ा" में "मधु" लगा हो, वह कोड़ा तो आखिर अपना कमाल किसी न किसी रूप में दिखायगा ही।

मधु कोड़ा जी ने कमाल दिखाया और पूछताछ के समय "महाजनो येन गतः स पन्थाः" की तर्ज पर घोटालेबाज "पूर्वजों" की तरह पहले तो बीमार पड़े फिर कह दिया कि सारे आरोप मेरे "स्वच्छ" छवि" को दागदार करने के लिए गढ़े जा रहे हैं। अब लीजिए - क्या कर लीजियेगा? इससे पहले किसी को कुछ हुआ क्या? फिर वही नेता, वही मंत्री, वही सब कुछ। हाँ एक बात तो हुई कि इसी बीच आम जनता के "आँसुओं की गंगा" में निरन्तर विस्तार हुआ है।

अब धीरे धीरे राज खुलेंगे। अखबार और न्यूज चैनलों को नया नया मसाला मिलेगा और उनके "समाचारों की गंगा" मस्त होकर बह निकलेगी। दिन बदल बदल कर ये लोग घोटालेबाजों के पक्ष और विपक्ष में अपनी बात को सनसनीखेज ढ़ंग से रखेंगे, ताकि "टी० आर० पी० की गंगा" अधिक से अधिक बहे और "विज्ञापन की गंगा" सिर्फ उसी की न्यूज एजेंसी की तरफ आकर्षित हो। आखिर भाई सबको रोजगार चाहिए कि नहीं?

लोकतंत्र की परिभाषा को यदि आज परिभाषित किया जाय तो उसे "जुगाड़ तंत्र" कह सकते हैं। कहना भी चाहिए। जो जितना जुगाड़ू है "विकास की गंगा" उसके तरफ उतना ही आकर्षित होती है। जुगाड़ तंत्र के लिए अनिवार्य शर्त है कि "धन की गंगा" बहती रहे, वो भी स्वस्थ और विकसित होकर। अब यही होगा, धन की गंगा बहेगी, जाँच का कोई परिणाम नहीं निकलेगा, जनता की स्मृति तो कमजोर होती ही है भूख और बेबसी के कारण। सब इतिहास के काले पन्नों मे दफ्न।

घोटाले के जाँच हित बनते हैं आयोग।
सच होगा कब सामने वैसा कहाँ सुयोग।।


भैया ज्ञानदत्त पाणडे गंगा पर बहुत लिखते हैं। उनसे ईर्ष्या हुई तो मैंने सोचा मैं भी कुछ न कुछ गंगा पर ही लिख दूँ। यहाँ जो भी लिखा, जैसा भी लिखा भेया ज्ञानदत्त को समर्पित है।

Thursday, November 12, 2009

दूरी

महल झोपड़ी की दूरी पर जो चिल्लाते हैं।
तोड़ झोपड़ियों को अवसर पे महल बनाते हैं।।

निर्धनता पर अच्छी बातें कहना उनकी फितरत है।
और आचरण में निर्धन से जिनको बिल्कुल नफरत है।
माँगे ताली मंच से ऐसे लगता कोई भिखारी हो,
देख भिखारी यूँ कहते कि यह तो उनकी किस्मत है।
मन माफिक जब रकम मिले तो मंच पे आते हैं।
तोड़ झोपड़ियों को अवसर पे महल बनाते हैं।।

लिखते हैं जिसके विरोध में अगर सामने आ जाये।
पलक पावड़े बिछा सामने मंत्र-मुग्ध हो मुस्काये।
कुछ पाने की आस में निष्ठा बेच रहे जो यहाँ वहाँ,
धीरे धीरे सृजनशीलता मर जाती तब पछताये।
सम्मानित होते रहने की जुगत भिड़ाते हैं।
तोड़ झोपड़ियों को अवसर पे महल बनाते हैं।।

रोज यहाँ मटमैला होता जो समाज का दर्पण है।
साहित्यिक परिभाषा जो थी लगता उसका तर्पण है।
प्रायोजित लिखने से अच्छा होता है कुछ न लिखना,
मन का भाव दिखे दर्पण पर यही सुमन का अर्पण है।
सफल वही रचना होती जो जन जन गाते हैं।
तोड़ झोपड़ियों को अवसर पे महल बनाते हैं।।

Sunday, November 8, 2009

बेबसी

बात गीता की आकर सुनाते रहे
आईना से वो खुद को बचाते रहे

बनते रावण के पुतले हरएक साल में
फिर जलाने को रावण बुलाते रहे

मिल्कियत रौशनी की उन्हें अब मिली
जा के घर घर जो दीपक बुझाते रहे

मैं तड़पता रहा दर्द किसने दिया
बन के अपना वही मुस्कुराते रहे

उँगलियाँ थाम कर के चलाया जिसे
आज मुझको वो चलना सिखाते रहे

गर कहूँ सच तो कीमत चुकानी पड़े
न कहूँ तो सदा कसमसाते रहे

बेबसी क्या सुमन की जरा सोचना
टूटने पर भी खुशबू लुटाते रहे
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