Tuesday, October 22, 2019

हम सब डर से सकपक साहिब

कपड़ा पहने झकझक साहिब
बोल रहे हैं अकबक साहिब

कहॉ घोषणा क्या कर जाएं
दिल करता है धकधक साहिब

नाम आपका जपते जपते
जनता करती बकबक साहिब

और आपके सभी समर्थक
अब दिखते हैं चकचक साहिब

भीड़ आपकी गाथा गाती
हम सब डर से सकपक साहिब

लोग आपको देख रहे हैं
आस लगाए टकटक साहिब

सुमन चेतना नित्य जगाए
दिन बहुरेंगे चकमक साहिब

खुद की खिदमत कर दो

अगर ज़िन्दगी जीना है तो खुद की नफरत कम कर दो
जहां मुहब्बत नहीं जरूरी वहां मुहब्बत कम कर दो

खुद का चेहरा जब दिखता हो आते जाते लोगों में
तब खुद को पहचानो प्यारे खुद की खिदमत कम कर दो

मर मिटने की कसमें खाना और निभाना बात अलग
खुद को तौलो फिर कसमें वादों की आदत कम कर दो

पास हमारे दो ही आंखें दुनिया पास हजारों हैं
दोष नहीं दुनिया में खोजो अपनी शिकायत कम कर दो

बार बार समझाने पर भी अगर सुमन कुछ ना समझे
वक्त उसे समझा देगा तू जरा हिफाजत कम कर दो

हम भाई के साथ रहें

 रहती हरदम सच्चाई के साथ रहें
उनकी चाहत हम नफरत की रानाई के साथ रहें

प्यार से जिसने बिठाया सर पे मत नाचो उसके सर पे
आम लोग सोचे वो कैसे बलवाई के साथ रहें

भाई भाई कहने में और बनने में कुछ अन्तर है
जहाँ रहें भाई भाई बन हम भाई के साथ रहें

हम सदियों से साथ रहे और प्यार से जीते आए हैं
वो कोशिश क्यों करते हम सब सौदाई के साथ रहें

वही मुकम्मल इन्सां है जो प्यार की खुशबू पहचाने
जिसे नहीं पहचान सुमन की रुसवाई के साथ रहें

Sunday, October 13, 2019

मानव को असमानी मत कर

दरिया को तूफानी मत कर 
सच से आनाकानी मत कर 

लोकतंत्र में बदले शासक 
खबरों को सुल्तानी मत कर

केवल सत्ता की खबरें क्यों
जनता को अज्ञानी मत कर 

आमजनों की लाचारी भी 
उसे दिखा, नादानी मत कर 

समझ रही है पब्लिक सब कुछ 
पब्लिक से बचकानी मत कर

शासक भी मानव होता है
मानव को असमानी मत कर

सुमन मीडियावालों चेतो 
अब आँसू को पानी मत कर 
सादर 
श्यामल सुमन

त्वरित न्याय का पैगाम

शिक्षक पढ़ा रहे थे  व्याकरण,
प्रश्न पूछा गया बताओ
समूहवाचक संज्ञा के उदाहरण,
उत्तर मिला - सभा, भीड़
सभा! अर्थात्
एक नेतृत्व और एक उद्देश्य।
लेकिन भीड़ !
यानि कोई नेतृत्व नहीं और
अलग अलग सबका ध्येय।

मगर हकीकत से हटकर
जब से सिर्फ भाषण में
हुआ है विकास का अवतरण
तब से पूरी तरह बदल गया है
सभा और भीड़ का समीकरण।
जिसके साथ ही बदल गया
हमारा सामाजिक व्याकरण।।

अब सभा को ना तो
एक नेतृत्व मिल पाता और
ना ही रह गया एक लक्ष्य का उपाय
लेकिन भीड़ ने शुरू किया एक नेतृत्व
और एक लक्ष्य का नूतन अध्याय।
इसलिए शायद अब भीड़,
करने लगी है त्वरित न्याय।

मुजरिम बनाना, पक्ष में दलील देना,
फैसला सुनाना और तत्काल सजा देना,
ये सारे रह गए हैं भीड़ के अब काम।
जिससे मुमकिन है मिले,
हमारी न्यायिक प्रक्रिया को
त्वरित न्याय करने का नया पैगाम।

सम्भव हो तो इसे तत्काल
अपनाने की जरूरत है,
और इसके लिए भला इससे
अच्छा कौन सा मुहूरत है?
जब लोग मुट्ठी बाँधने के बजाय
स्वतः मुट्ठी खोल रहे हैं
और मदहोश होकर
सत्ता की भाषा बोल रहे हैं।
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