Thursday, August 30, 2018

यूँ तो हैं अंगूर खट्टे

आग को पानी बुझा दे पानी में भी आग है
ऐ समन्दर! शोर तेरा पर छुपा इक राग है

क्या बुराई किसमें कितनी कह रहा है हर कोई
कहने वाले कहते अक्सर चाँद में भी दाग है

जो थी पाने की तमन्ना वो अगर ना मिल सका
यूँ तो हैं अंगूर खट्टे, कहने को बैराग है

इस तरह से आमलोगों को छला एक आदमी
फिर बना शासक सभी का कौन सा अनुराग है

आया पतझड़ तो सिखाते डरने की है बात क्या
अब तो बाजारों में मिलते हर सुमन और बाग है 

Sunday, July 29, 2018

तू पत्थर सी मूरत बन जा

कली कभी तू मत घबराना,
बन के सुमन तुझे है आना,
कोई आंसू देख सके ना, तू पत्थर सी मूरत बन जा।
वक्त से ऐसे लड़ते रहना, कल की एक जरूरत बन जा।।

धरती जैसे इस जीवन में सुख दुख घूम रहा है।
संकट में जो आज उसी को कल सुख चूम रहा है।
जीत समय को तू ऐसे कि सबकी प्यारी सूरत बन जा।।
कल की एक जरूरत बन जा, तू पत्थर सी मूरत बन जा।।

सीता का दुख और द्रोपदी अपनी महक लिए है।
जितना भी तपता है सोना उतनी चमक लिए है।
वैसे जूझ, बसो यादों में, सबके लिए मुहुरत बन जा।।
कल की एक जरूरत बन जा। तू पत्थर सी मूरत बन जा।। 

Wednesday, July 25, 2018

बोली जब बचकानी हो

यादें भले पुरानी हो
नूतन रोज कहानी हो

देवराज कोई होगा
इक परियों की रानी हो

छोटे बच्चों के संग में
दादा, दादी, नानी हो

और बुजुर्गों की खातिर
आँखों में भी पानी हो

लगे दूर जाना अच्छा
बेटी जहाँ सयानी हो

लगता है कितना प्यारा
बोली जब बचकानी हो

गम से लड़ते रहने से
चाल सुमन मस्तानी हो

Monday, July 23, 2018

जिसने दिल में मलाल रक्खा है

अपने दिल को निकाल रक्खा है
गीत, गजलों को पाल रक्खा है

किसी के दिल में वो उतरता जो
आँखों में आँख डाल रक्खा है

साथ उसके नहीं कोई जाता
जिसने दिल में मलाल रक्खा है

चलते चलते अगर गिरे कोई
मैंने उसको सम्भाल रक्खा है

कल तो आता नहीं कभी फिर क्यूँ
फैसला कल पे टाल रक्खा है

काम का नूर दिखता आँखों में
क्यूँ बजाने को गाल रक्खा है

सोच करके सुमन भी ये सोचा
कुछ तो जिन्दा सवाल रक्खा है 

Saturday, June 23, 2018

क्या बिटिया की लाज अलग है?

एक भाव मुमकिन गीतों में कहने का अंदाज़ अलग है
कल कैसा था क्या कल होगा इन बातों से आज अलग है

अक्सर बिकते आज कलम भी कीमत भले अलग होती है
जिसे दाम ज्यादा मिल जाता तब उसकी आवाज अलग है

अगर किसी की लुटती अस्मत चर्चाएं उसके मजहब की
हिन्दू ,मुस्लिम मत समझाओ क्या बिटिया की लाज अलग है

बार बार बदले हैं शासक क्या शासन भी बदल सका है
गौर से देखो तो लगता है राज एक पर साज अलग है

हिम्मत सच लिखने की है तो लिखने का हक प्यारे तुझको
राग सुमन दरबारी लिखकर मिलनेवाला ताज अलग है
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