Tuesday, November 10, 2020

मैं खुद में खो जाता हूँ

ऑंखें तुमसे जब मिलतीं हैं, मैं खुद में खो जाता हूँ 
तेरे दिल की तुम जानो पर, मैं तेरा हो जाता हूँ 

तड़प तड़प के रहना पड़ता, तेरा मौन पुकारे जब
हाय! बेबसी अपने दिल में, बस आँसू बो जाता हूँ 

बिन बोले भी प्यार तुम्हारा, दिल में गहरा यूँ उतरा
चाहत तू मेरी मंजिल बन, मैं मंजिल को जाता हूँ 

कैसी ये दुनियादारी जो, मिलके भी मिलना मुश्किल 
आँखों आँखों में बतियाकर, चुपके से रो जाता हूँ 

बहुत अधूरा सा लगता है, सुमन तुम्हारे बिन जीना
बना बोझ सा अपना जीवन, हंस करके ढो जाता हूँ 

लोक-जागरण प्रण आजीवन

ये मत समझो सिर्फ आपको, गीत सुनाने आए हैं।
लोक-जागरण प्रण आजीवन, लोक जगाने आए हैं।।

आपस में बतियाते हम सब, जंग को माया कहते हैं।
पर चुपके से माया धन की, अर्जन करते रहते हैं।
हम शब्दों के बने आईना, को दिखलाने आए हैं।
लोक-जागरण प्रण आजीवन -----

जरा सोचना नींव का पत्थर, अपने घर का कौन रखा।
देख बेबसी उनकी फिर भी, हमने खुद को मौन रखा।
आनी जानी इस दुनिया का, बोध कराने आए हैं।
लोक-जागरण प्रण आजीवन -----

जीने का ढंग अलग सुमन पर, इक समान हम दिखते हैं।
नहीं बराबर सुख सुविधा क्यों, इस अन्तर को लिखते हैं।
इस कारण से जंग धरा पर, उसे मिटाने आए हैं।
लोक-जागरण प्रण आजीवन -----

छुपे हो तुम कहाँ सूरज

छुपे हो तुम कहाँ सूरज, पता दो उस ठिकाने का
अँधेरा  जो  घना  उससे, इरादा आजमाने  का

हमें आता है लड़ना भी, हमहीं लड़ना सिखाते हैं
ये सदियों की लड़ाई है, सभी को हक दिलाने का

कलम को भी चलाते हम, मशालें भी जलाते हम
तुम्हें जो चाहिए, थामो, मगर  है साथ  आने का

लहू भी एक सा अपना, हवा, पानी भी इक जैसा
सभी इन्सान इक जैसे, यही रिश्ता निभाने का

भला सोचो सुमन हमको, जरूरत क्या है बँटने की
अगर  कुछ  सोच से अँधे, उसे रस्ता दिखाने का 

पहले खुद को नंगा देख

अपने भीतर गंगा देख
पहले खुद को नंगा देख

खुशी खुशी तू गम को जी
तब जीवन सबरंगा देख

भारत सोने की चिड़िया
भटक रहे भिखमंगा देख

लोकतंत्र के मंदिर में
कुछ सियार हैं रंगा देख

कह करके भाई, भाई
करवाते क्यों दंगा देख

खुद जी ले, जीने भी दे
यार सभी को चंगा देख

सुमन विश्व भर में हमसब
फहरा रहे तिरंगा देख?

हाथ बिहारी के मशाल है

एक सियासी यह कमाल है
हाथ बिहारी के मशाल है

आगे बढ़ता है बिहार जब
रोक सके किसकी मजाल है

परिवर्तन की आँधी लाकर
साथ देश के कदमताल है

पढ़े लिखे कम होने पर भी
सत्ता से करता सवाल है

लोक-जागरण की ये धरती
सचमुच भारत में मिसाल है

लफ्फाजों की शामत आयी
निम्न-वर्ग की आँख लाल है

सदा बिहारी संविधान को
रखा सुमन माथे संभाल है
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