Monday, April 22, 2019

मनुवा खिन्न हुआ

देख बहस टीवी पर मनुवा खिन्न हुआ
लोकतंत्र भी अब पहले से भिन्न हुआ

भ्रष्टाचार मिटाने खातिर जो आए
भ्रष्टाचारी उनका मित्र अभिन्न हुआ

रूप सुनहरे ले कर आते सत्ता में
वो लगता क्यूँ खतरनाक सा जिन्न हुआ

जीत उसी को मिलती जिसको पैसा है
गुणवानों को इस चुनाव से घिन्न हुआ

सामाजिक समरसता दौलत है अपनी
सुमन अभी तो लगता वो भी छिन्न हुआ 

मगर बरसते धन चुनाव में

मीत कौन दुश्मन चुनाव में
उलझन ही उलझन चुनाव में

लोग करोड़ों भूखे मरते
मगर बरसते धन चुनाव में

जो गरियाते इक दूजे को
साथ करे भोजन चुनाव में

लोग निराशा में, पर कहते
जुड़ा हुआ जन जन चुनाव में

घर में भी प्रतिद्वंदी मिलते
बूथ बना आँगन चुनाव में

परम्परा या प्रगतिशीलता
चुनो, बना के मन चुनाव में

आनेवाले कल की खातिर
सुमन जलाए तन चुनाव में 

टी वी में

समाचार देखूँ तो आफत, ना देखूँ तो आफत है
बार बार क्यों एक ही चेहरा वे  दिखलाते टी वी में

हो सकता है सब कुछ मुमकिन खास आदमी आए तो
रोज रोज क्यों इसी बात को वे दुहराते टी वी में 

तब से है कंगाल मीडिया

अब तो मालामाल मीडिया
करता नहीं सवाल मीडिया

चौथा खम्भा अब सियार सा
ओढ़ शेर की खाल मीडिया

विज्ञापन हथियाने ख़ातिर
दिखता आज दलाल मीडिया

धीरे धीरे समझ रहे सब
बिल्कुल मायाजाल मीडिया

जब से अंकुश धनवानों का
तब से है कंगाल मीडिया

बिन मुद्दे का प्रश्न उठाकर
करता खूब धमाल मीडिया

नाखुश ना हो सत्ता वाले
रुख बदले तत्काल मीडिया

लेकिन अब भी इस पेशे में
कुछ भारत के लाल मीडिया

सुमन मीडिया अब शोसल भी
नहीं गलेगी दाल मीडिया 

कौन बड़ा मुँहजोर है

चौकीदारी सबकी अपनी फिर काहे का शोर है
कोई कहता संत उसे तो कोई कहता चोर है

हर चुनाव में लेकर आते नए पिटारे वादों का
सचमुच अच्छा किसे मान लें उलझन भी घनघोर है

छिड़ी लड़ाई है मंचों पर भाषा में तल्खी ऐसी
कहना मुश्किल हुआ आजकल कौन बड़ा मुँहजोर है

बहस हमेशा जारी रहती समाचार जब जब देखो
निर्णय करना ये मुश्किल कि अभी साँझ या भोर है

छली गयी है जनता अबतक चाल सियासी में फँसकर
सुमन जगाओ लोक चेतना जहाँ जहाँ कमजोर है
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