Thursday, September 17, 2020

तुम समझो या न समझो

ये दुनिया हम सबकी भाई, तुम समझो या न समझो

राम सभी के कृष्ण कन्हाई, तुम समझो या न समझो


लहु हमारा एक रंग का इक समान  ही दिखते हम

फिर क्यों आपस में रुसवाई, तुम समझो या न समझो


समझ नहीं जागीर ये दुनिया आते जाते रहते हम

बस कर्मों की शेष कमाई, तुम समझो या न समझो


गद्दी उसने तुझे सौंप दी जो गुरबत में जीते हैं

राजा साबित हवा हवाई, तुम समझो या न समझो


है गवाह इतिहास हमारा आमलोग जग जाते जब

कितनों को औकात दिखाई, तुम समझो या न समझो


वक्त से पहले चलो संभल के या पछताओ आगे भी

जाग उठी सचमुच तरुणाई, तुम समझो या न समझो


अलख जगाना काम कलम का लाखों सुमन कलम थामे 

फिर मत कहना आग लगाई, तुम समझो या न समझो

इस चिक चिक से नहीं शिकायत

हरदम मिलने की हो चाहत, तेरा मेरा साथ रहे

है तुम बिन बेकार ये जन्नत, तेरा मेरा साथ रहे


प्यार खुलापन माँगे यारों लेकिन शादी बन्धन है

फिर भी शादी एक रवायत, तेरा मेरा साथ रहे


नोंक-झोंक आपस में अक्सर नयी ताजगी देती है

इस चिक चिक से नहीं शिकायत, तेरा मेरा साथ रहे


बात बिना, आँखों के रस्ते दिल को पढ़ना सीख जरा

धीरे धीरे बनेगी आदत, तेरा मेरा साथ रहे


आँगन में उतरे किलकारी फिर बन्धन मजबूत हुआ

रहे खुदा की सदा इनायत, तेरा मेरा साथ रहे


चेहरे पर बढ़ती झुर्री सँग आपस में भी प्यार बढ़ा

तुम बिन अब जीना भी आफत, तेरा मेरा साथ रहे


इक दिन भी बाहर जाना तो सुमन बिना कैसे जाऊँ 

इक दूजे से मिलती ताकत, तेरा मेरा साथ रहे

सादर

श्यामल सुमन

आमलोग हैं नींव के पत्थर

लोगों के सपनों को लिख कम लिखना या ज्यादा लिख

दर्द हमेशा दर्द ही रहता उलटा लिख या सीधा लिख


सबके जीवन में कुछ उलझन, सुलझाते अपने ढंग से

सुलझाने अपनी उलझन को किया जो खुद से वादा लिख


आमलोग हैं नींव के पत्थर जिस पर खड़ा महल तेरा

राजा वही बनाते उसको फर्जी लिख या प्यादा लिख


आज से अच्छा कल हो अपना सब कोशिश करते रहते

कल की पीढ़ी भी यूं सोचे पूरा लिख या आधा लिख


बेहतर से बेहतर हो दुनिया मिल के कोशिश करें सभी

और सुमन तू राह में सम्भव आने वाली बाधा लिख

खुद पिंजड़े से निकल रहे हैं

लोग-बाग अब बदल रहे हैं

खुद पिंजड़े से निकल रहे हैं


कितने दिन तक हवा हवाई?

वादा करके फिसल रहे हैं


वैसे लोग कहाँ मिलते जो

निज-वादों पर अटल रहे हैं


भ्रम टूटा तो परिवर्तन को

युवा-वर्ग ही मचल रहे हैं


परिवर्तन है नियम जगत का

यहाँ कौन जो अचल रहे हैं?


सीख शलाका व्यक्तित्वों से

जो जीवन में सफल रहे हैं


वाक्-जाल में उलझा जो भी

अभी सुमन वो संभल रहे हैं

आमलोग में जोर अभी है

लोकतंत्र का भोर अभी है

जो खतरे में, शोर अभी है


जिनको हम चुन भेजे उनमें

अपराधी घनघोर अभी है


मंत्री से संतरी तक देखो

जगह जगह में चोर अभी है


बन्द सभी कुछ कोरोना में

मन बहलाओ, मोर अभी है


साधु संत घिरे हैं शक में

उनमें भी चितचोर अभी है


सजग लोग से आस सभी को

आमलोग में जोर अभी है


शासक की सीमा तय करने

सुमन हाथ में डोर अभी है

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