Sunday, November 8, 2009

बेबसी

बात गीता की आकर सुनाते रहे
आईना से वो खुद को बचाते रहे

बनते रावण के पुतले हरएक साल में
फिर जलाने को रावण बुलाते रहे

मिल्कियत रौशनी की उन्हें अब मिली
जा के घर घर जो दीपक बुझाते रहे

मैं तड़पता रहा दर्द किसने दिया
बन के अपना वही मुस्कुराते रहे

उँगलियाँ थाम कर के चलाया जिसे
आज मुझको वो चलना सिखाते रहे

गर कहूँ सच तो कीमत चुकानी पड़े
न कहूँ तो सदा कसमसाते रहे

बेबसी क्या सुमन की जरा सोचना
टूटने पर भी खुशबू लुटाते रहे

Thursday, November 5, 2009

चेतना

कहीं बस्ती गरीबों की कहीं धनवान बसते हैं।
सभी मजहब के मिलकर के यहाँ इन्सान बसते हैं।
भला नफरत की चिन्गारी कहाँ से आ टपकती है,
जहाँ पर राम बसते हैं वहीं रहमान बसते हैं।

करे ईमान की बातें बहुत नादान होता है।
मिले प्रायः उसे आदर बहुत बेईमान होता है।
यही क्या कम है अचरज कि अभीतक तंत्र जिन्दा है,
बुजुर्गों के विचारों का बहुत अपमान होता है।।

सभी कहते भला जिसको बहुत सहते हैं बेचारा।
दया का भाव गर दिल में उसे कहते हैं बेचारा।
है शोहरत आज उसकी जो नियम को तोड़ के चलते,
नियम पे चलने वाले क्यों बने रहते हैं बेचारा।।

अलग रंगों की ये दुनिया बहुत न्यारी सी लगती है।
बसी जो आँख में सूरत बहुत प्यारी सी लगती है।
अलग होते सुमन लेकिन सभी का एक उपवन है,
कई मजहब की ये दुनिया अलग क्यारी सी लगती है।।

Sunday, November 1, 2009

शरद-स्वरूप

जाड़े की शुरूआत और अपने लेखन के शुरूआती दिनों की इस रचना की याद आयी, जिसमें सम्पन्न और निर्धन को जाड़ा कैसे प्रभावित करता है, को दिखाने की कोशिश मैंने कभी की थी-

शरद सुहावन उसी का होता जिसके तन पर कपड़ा हो।
वो कैसे जीता है जिनको रोटी का भी लफड़ा हो।।

मनमोहक श्रृंगार धरा का फूलों की आयी बारात।
सूर्योदय हो काम पे जाऊँ इसी आस में कटती रात।।

प्रथम किरण संग ओस घास पर मोती जैसा लगता है।
इक धोती ही वस्त्र-रजाई यूँ जाड़े को ठगता है।।

रंग-बिरंगे परिधानों में मौज उड़ाने का मौसम।
एक लक्ष्य है उदर-भरण ही चिन्तित रहता है हरदम।।

ठंढ़ बढ़ी और खबरें चमकीं पढ़ते जो पढ़ने लायक।
बहुत बेखबर वही खबर से जो है खबरों का नायक।।

यह किस्मत की बात नहीं है कारक जर्जर तंत्र।
सर्वे भवन्तु सुखिनः का हम भूल गए क्यों मंत्र।।

ठिठुर रहा जनवाद आज क्यों पनप रहा क्यों जंगल-राज।
सत्यार्थी बन कलम उठायें बच सकती जनता की लाज।।

किसी तरह यह नहीं हुआ तो शरद आग उगलेगा।
सिसकेगी मानवता घर घर उपवन में सुमन जलेगा।।

Friday, October 30, 2009

पुकार

लूट लिया है रखवालों ने चप्पा चप्पा भारत का।
राजनीति और जनसेवा तो पेशा बना तिजारत का।।

जगत-गुरू कहते हम खुद को रूप बदलकर बार बार।
ज्ञान, योग की सीख थी पहले आज सिखाते भ्रष्टाचार।।

ढ़ोंग रचाकर जनसेवा का निज-सेवा करते जन-नायक।
राष्ट्र-द्रोह को राष्ट्र-प्रेम की संज्ञा देते हैं नालायक।।

घोटाला अब राष्ट्र-धर्म है पशुता बनी राष्ट्र की भाषा।
निश्चित सबकी टूट चुकी है राम-राज्य पाने की आशा।।

कलियाँ ही नित कुचलीं जातीं कैसे सुमन खिले उपवन में।
एक राह अब है बचने का क्रांति उठे फिर जन-गण मन में।।

Wednesday, October 21, 2009

सबरंग दोहे-३

पुनः वही संकलित टिप्पणियों का तीसरा और अंतिम भाग जो आपलोगों की रचनाओं पर मैंने कभी भेजे थे। इसके कुछ और अंश "सबद-लोक" के लिए भेज दिया हूँ।

तन की सीमा से भली मन की सीमा जान।
मन को वश में कर सके वही असल इन्सान।।

आशा की किरणें जगी भले अंधेरी राह।
नीरवता सुख दे जिसे गजब है उसकी चाह।।

अभिनय करने में यहाँ नेता बहुत प्रवीण।
भाषण, आश्वासन सहित खींचे चित्र नवीन।।

खट्टी भी मीठी लगे जब हो प्रियतम पास।
उस क्षण को बस याद कर होते नहीं उदास।।

व्यंग्य-बाण के साथ में हो रचना में धार।
नीति बदलना है अगर जनता के अनुसार।।

किया बहुत मैंने यहाँ गम दुनिया की बात।
प्रथम मिलन को याद कर जो था इक सौगात।।

हर विकास के नाम पर क्या होता है आज।
सबकी कोशिश से बचे दीनों की आवाज।।

श्लील और अश्लील में कौन बताये भेद?
आदम युग हम जा रहे प्रकट करेंगे खेद।।

रचना भी थी आपकी भाव आपके खास।
सुमन सजाया बस इसे कैसा रहा प्रयास?
हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!