Thursday, June 23, 2016

योग बना उद्योग

जीवन की शैली कभी, घर घर में था योग।
युग बदला अब देखिये, योग बना उद्योग।।

ध्यान, धारणा भूलकर, कुछ आसन पर जोर।
कसरत होता देह का, मन रहता कमजोर।।

योग जरूरत आज की, करो नियम से यार।
खुद से होगा प्यार तब, दुनिया से भी प्यार।।

जीवन का मतलब तभी, अगर रहें नीरोग।
पर मजहब से जोड़कर, व्यर्थ झगड़ते लोग।।

कुछ कारण से विश्व ने, योग किया स्वीकार।
परम्परा जो देश की, मिला सुमन विस्तार।।

नहीं किसी को DEAR बोल

भले NOSE को EAR बोल
नहीं किसी को DEAR बोल

शासक का है खौफ यहाँ
साहस को भी FEAR बोल

रिश्ते, सरकारी जनता से
दूर बहुत, पर NEAR बोल

जहर उगलते, जो घर घर
उस सियार को DEER बोल

भूख सुमन की, तुमको क्या
BEAR भर के CHEER बोल

नोट - हिन्दी प्रेमियों से मुआफी की अपील के साथ 

बच्चों का संसार

प्रज्ञा नतिनी सुमन की, बरस उम्र बस चार।
पर देखा तस्वीर में, दुलहन सा श्रृंगार।।

बिटिया, नतिनी या बहन,  नारी सदा अनूप।
आँखें हटती है नहीं, मोह लिया यह रूप।।

प्रज्ञा मेरी गजल को, गाती है भरपूर।
टूटे फूटे शब्द से, करती गम को दूर।।

रूप मनोहर जो यहाँ, टिकते जब तब नैन।
बिना चुहलबाजी किए, मिले न दिल को चैन।।

प्यारे से इस रूप पर, उमड़ पड़ा है प्यार।
सदा वयस्कों से अलग, बच्चों का संसार।।

मौसेरे भाई सभी

जनता की तकलीफ पर, करता कौन विचार।
आज न्याय सन्देह में, बिका हुआ अखबार।।

छले गए जन जन सदा, मची हुई है लूट।
बड़े लोग पाते रहे, यहाँ अधिकतम छूट।।

मुद्दों पर ना बोलना, दिल को तब आघात।
सुना रहे जबरन मगर, अपने मन की बात।।

पक्ष विपक्षी लड़ रहे, हैं आरोप अनेक।
मौसेरे भाई सभी, अन्दर अन्दर एक।।

अपनी बातों को सुमन, मनवाने पर जोर।
सांसत मे संसद अभी, केवल होता शोर।।

हड्डी टूटी पाँव की

हड्डी टूटी पाँव की, पच्चीस दिन विश्राम।
परिजन संग बीता समय, कल से होगा काम।।

पढने का मौका मिला, नया लिखा कुछ रोज।
खुशियाँ मिलतीं है अगर, दुख में सुख की खोज।।

मिलने को आते रहे, रोज शहर के लोग।
यूँ तो खर्चा भी बढ़ा, अच्छा लगा सुयोग।

माता कहती थी मुझे, सुन लो एक विचार।
सुजन स्वजन आते सदा, भाग्यवान के द्वार।।

दर्द अभी भी पाँव में, पर हिम्मत कर आज।
पहले जैसा ही पुनः, सुमन करे सब काज।।
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