Wednesday, March 17, 2021

स्वार्थ कितना गरीब है?

साथ साथ रहकर भी अक्सर
हर एक, दूसरे का रकीब है।
जिसे समझना बहुत कठिन है,
सचमुच! ये दुनिया कितनी अजीब है?

स्वार्थ है, परमार्थ है
हमारे हर काम का विशेषार्थ है।
इसे विवेचनार्थ जब सोचता हूँ
तो पाता हूँ कि प्रत्यक्षतः
स्वार्थ तो अक्सर जीवन के
साथ ही दिखता है और
परमार्थ! जीवन के बाद भी
साथ साथ टिकता है।
परमार्थ सदा सम्पन्न है
और स्वार्थ कितना गरीब है?
सचमुच! ये दुनिया कितनी अजीब है?

ज्ञान है, अज्ञान है,
हर विधा का अपना विज्ञान है,
जिस पर कुछ का ध्यान है तो
कितनों के लिए यह सिर्फ अनुमान है।
जरूरत के हिसाब से उसका
जब लेता हूँ संज्ञान तो पाता हूँ कि
ज्ञान सदा ही साथ में टिकता है
और अज्ञान! दिन रात
ज्ञान के नाम से बिकता है।
जबकि ध्यान से सोचो तो
ज्ञान और अज्ञान बिल्कुल करीब है।
सचमुच! ये दुनिया कितनी अजीब है?

धर्म है, अधर्म है,
सबका अपना अपना कर्म है
कोई कहता कुकर्म है तो
कोई, उसे ही कहता सुकर्म है।
इसके मर्म पर जब नर्म होकर
विचार करता हूँ तो पाता हूँ कि
धर्म की ओट में अधर्म बिकता है
और हमारे कर्मों का फल
हमारे जीवन में साफ साफ दिखता है।
सब कहते कि हमारे कर्म से ही
बनता हम सबका नसीब है।
सचमुच! दुनिया कितनी अजीब है?

उल्टा सच दिखलाता दर्पण

बहुत कीमती जीवन सबका, जीवन से हम आस करें
उल्टा सच दिखलाता दर्पण, फिर किस पर विश्वास करें

जीवन सबका एक जंग है, लड़ते सब अपने ढंग से
जी कर भी हम आम जिन्दगी, कुछ तो बेहद खास करें

तकलीफों में आमलोग तो, मन से आह निकलती है
क्यूँ न मिल कुछ यूँ कर लें कि, दर्ज नया इतिहास करें

चेहरा तो बस एक है सबका, जिसमेें रूप हजारों हैं
अपने अन्दर उतर के फिर से, चल उसका एहसास करें

नहीं जरूरी साबित करना, हम अच्छे हैं दुनिया में
काम बोलता सबका अपना, दुनिया सुमन सुवास करें

गणतंत्र सलामत हो

जितनी भी आफत हो
बस दिल में भारत हो

सुलझा लो मिलजुल के
जो तुझे शिकायत हो

जो बाँट रहा उसकी
दिन रात मलामत हो

है देश बड़ा अपना
हर जगह हिफाजत हो

देते जवाब सैनिक
यदि कहीं हिमाकत हो

ये देश बढ़ेगा तब
जब सबकी इज्जत हो

हर हाल सुमन अपना
गणतंत्र सलामत हो

Sunday, January 3, 2021

जिन्दा इक इन्सान हो

नए साल में सकल विश्व की पीड़ा का अवसान हो
मिले कहीं विपरीत सोच तो उसका भी सम्मान हो

इस जीवन का मूल प्रेम है दुनिया चलती प्रेम से
प्रेम-सुधा बरसे हर दिल में ऐसा नित भगवान हो

सबके घर में दुख से लड़के ही खुशियाँ आ पातीं हैं
मिल के कोशिश अगर करें तो हर चेहरे मुस्कान हो

मानव और पशु की चर्या लगभग एक समान है
बस विवेक से श्रेष्ठ है मानव सबको इसका ज्ञान हो

कोशिश में है सुमन हमेशा ऊँच नीच का भेद मिटे
आदम-रूप में सबके भीतर जिन्दा इक इन्सान हों

हे महाकाल!

हे महाकाल!
क्यों लेकर आए बीस-बीस सा साल,
काल के गाल, महाविकराल, 
कुछ समा गये उसमें,
कुछ के सामने जीने का सवाल
फिर कब सुधरेंगे सबके हाल?
हे महाकाल!

जब आमलोगों की आम जिन्दगी,
परिस्थितियों से हलकान हो,
जिन्दगी और मौत में,
मौत चुनना आसान हो,
जीवित लोगों में जीने की जद्दोजहद,
चारों तरफ निराशा ही निराशा बेहद,
फिर क्यों इन अर्धमृत लोगों पर
फेंके जा रहे हैं प्रतिदिन, प्रतिपल,
कूटनीतिक और सियासी जाल?
हे महाकाल!

दुनिया उम्मीद पर जीती है,
शायद इसलिए जहर गमों का पीती है,
स्वाभिमान के साथ जीना,
बहुजन के सामने ज्वलंत प्रश्न है,
लेकिन कुबेर और सियासी लोगों के लिए,
ये जिन्दगी सिर्फ जश्न ही जश्न है।
क्या इन्साफ करोगे और मिटाओगेअसमानता?
क्या रोक पाओगे ये रोज रोज का बवाल?
हे महाकाल!

हमसे तुम हो, तुमसे हम नहीं,
अगर तुझे गम नहीं तो हमें भी गम नहीं,
तुम्हारे लिए हमारे समान कौन है दूजा?
हम मिट गए तो फिर कौन करेगा तेरी पूजा?
सोच़! सोचो!! महाकाल,
हमारे लिए नहीं अपने अस्तित्व की खातिर सोचो,
आजमाओ अपनी ताकत और बताओ कि
क्या ला पाओगे आमलोगों के लिए,
उम्मीदों से भरपूर एक नया साल?
हे महाकाल!
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