Wednesday, August 18, 2021

कुछ शर्म जरूरी है?

इस दुनिया में जीने खातिर कर्म जरूरी है।
मुझसे कहीं गलत न हो कुछ शर्म जरूरी है।।

मिल जुलकर आपस में जीना, सभी धर्म कहते हैं।
मगर धर्म के वहशीपन में क्या कुछ हम सहते हैं??
धर्म की सत्ता या सत्ता का धर्म जरूरी है?
मुझसे कहीं गलत न -----

हक सबको है अपने ढंग से, दुनिया में जीने का।
करे लोग मजबूर जहर क्यों मजहब के पीने का??
मानवता बच पाए दिल में मर्म जरूरी है।
मुझसे कहीं गलत न -----

सदियों से ही धर्म नाम पर अनगिन लोग मरे हैं।
उसी धर्म के पागलपन में फिर क्यों जुल्म करे हैं??
हाल देखकर सुमन का होना गर्म जरूरी है।
मुझसे कहीं गलत न -----

तो समन्दर डर गया

आजकल दिन में अंधेरे, क्या कहें फिर रात की
फख्र से ज्यादा अभी है, फिक्र इस हालात की

गमजदा लोगों को देखा, तो समन्दर डर गया
उसको डर है आँसुओं की, हो रही बरसात की

कोशिशें हैं दहशतों से, कैद दुनिया को करें
हक तो आजादी हमारा, जंग है जज्बात की

डंडे, लाठी, गोलियां भी, कम पड़ेंगी शातिरों
दर्ज इतिहासों में वो, जिसने अमन की बात की

बच गयी इन्सानियत तो, मौत भी मंजूर है
फिर सुमन डोली सजेगी, हो खुशी बारात की

हृदय शेष पछतावा

हंसा ! करियो नहीं दिखावा।
एक न एक दिन तो आएगा, यम का यहाँ बुलावा।।
हंसा! करियो -----

अपने खातिर लूट पाट के, धन अरजे बहुतेरे।
वो अपने अब हुए पराये, समझ करम के फेरे।
अन्त काल में बेबस काया, हृदय शेष पछतावा।
हंसा ! करियो -----

रीति यही दुनिया में सबको, अपना सुख है प्यारा।
वो सुख दूना, अगर बने हो, दुख में कहीं सहारा।
यही धरम है व्यर्थ भटकते, तुम काशी या काबा।
हंसा! करियो -----

हर पेशे में, पाखंडी जो, सजा रखे निज मेले।
बिना डरे वो सहज लोग के, जीवन से ही खेले।
भोगा सत्य सुमन कहता है, देता नहीं भुलावा।
हंसा! करियो -----

लोग जपे वो नाम

सच्चे कर्मों के लिए, अगर मिले सम्मान।
सम्मानों का मान तब, वरना है अपमान।।

अपने अपने कर्म का, सबको है अहसास।
मिहनत से जो भी मिले, उसमें बहुत मिठास।।

बारिश अब सम्मान की, मची हुई है लूट।
सजग नजर से देखिए, कहीं न जाए छूट।।

प्रायोजित सम्मान का, क्या कुछ भी है मोल?
बाहर में मुस्कान पर, खुशी हृदय से गोल।।

जो समाज-हित में सदा, करते रहते काम।
बिन पाए सम्मान भी, लोग जपे वो नाम।।

भूखे क्यों सम्मान के, बिना कर्म के लोग?
फैल रही यह भूख ज्यों, हो संक्रामक रोग।।

सुमन पसीना को समय, देता हरदम मान।
तभी स्वत: कहते सभी, मिला उचित सम्मान।।

घर-आँगन की बात करें

लाया है बैशाख तपिश तो, चल सावन की बात करें
जो हालात विवश कर दे फिर, परिवर्तन की बात करें

रोटी, शिक्षा और चिकित्सा, इतना भी गर मिल जाए
आमलोग तब आपस में नित, घर-आँगन की बात करें

बच्चे जो भी आज हमारे, वो कल के नायक होंगे
नफरत की आँधी हम रोकें, उसी जतन की बात करें

खून बहाया जो धरती पर, क्या उसने कुछ पाया है?
दर्ज सभी है इतिहासों में, नये चलन की बात करें

आपस में मिल्लत हो जितना, दुनिया उतनी बेहतर हो 
प्यार की खुशबू घर घर बाँटे, चलो सुमन की बात करें
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