वो घड़ी, हर घड़ी, याद आती रहे
गम भुलाकर जो खुशियाँ सजाती रहे
जिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहा
राख बन के भी खुशबू लुटाती रहे
कभी सुनता क्या बुत भी इबादत कहीं
घण्टियाँ क्यों सदा घनघनाती रहे
प्यार सागर से यूँ है कि दीवानगी
मिल के नदियाँ ही खुद को मिटाती रहे
डालियाँ सूनी है पर सुमन सोचता
काश चिड़ियाँ यहाँ चहचहाती रहे
गम भुलाकर जो खुशियाँ सजाती रहे
जिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहा
राख बन के भी खुशबू लुटाती रहे
कभी सुनता क्या बुत भी इबादत कहीं
घण्टियाँ क्यों सदा घनघनाती रहे
प्यार सागर से यूँ है कि दीवानगी
मिल के नदियाँ ही खुद को मिटाती रहे
डालियाँ सूनी है पर सुमन सोचता
काश चिड़ियाँ यहाँ चहचहाती रहे
सार्थक सोच की अच्छी अभिव्यक्ति / अच्छी विवेचना के साथ प्रस्तुती के लिए धन्यवाद / मैं तो कहता हु ब्लॉग सामानांतर मिडिया के रूप में उभर कर ,इस देश में वैचारिक क्रांति का सबसे बड़ा वाहक बनकर ,इस देश में बदलाव जरूर लायेगा / बस जरूरत है एकजुट होकर सच्ची इक्षा शक्ति से प्रयास करने की /आपको मैं , जनता के द्वारा प्रश्न पूछने के लिए ,संसद में दो महीने आरक्षित होना चाहिए, इस विषय पर बहुमूल्य विचार रखने के लिए आमंत्रित करता हूँ /आशा है देश हित के इस विषय पर,आप अपना विचार कम से कम सौ शब्दों में जरूर रखेंगे / अपने विचारों को लिखने के लिए नीचे लिखे हमारे लिंक पर जाये /उम्दा विचारों को सम्मानित करने की भी व्यवस्था है /
ReplyDeletehttp://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html
zindagi aur agarbatti ke ehsaas .... bahut hi achhe lage
ReplyDeleteजिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहा
ReplyDeleteराख बन के भी खुशबू लुटाती रहे
अति सुन्दर सुमन जी,
मगर
कभी सुनता क्या बुत भी इबादत कहीं
घण्टियाँ क्यों सदा घनघनाती रहे
मुझे लगता है क़ि जब सारी रचना सकारात्मक पहलू को उजागर कर रही है तो यह प्रश्नवाचक लाइने बीच में जम नहीं रही उन्हें भी सकारात्मक बनाए !
राख बन के भी खुशबू लुटाती रहे
ReplyDeleteबहुत खूब...
बहुत सुन्दर ग़ज़ल है ! हरेक शेर अच्छा है ... ये दो शेर मुझे बहुत अच्छा लगा ....
ReplyDeleteजिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहा
राख बन के भी खुशबू लुटाती रहे
प्यार सागर से यूँ है कि दीवानगी
मिल के खुद को ही नदियाँ मिटाती रहे
आपकी लेखनी से बस चाहेंगे इतना,
ReplyDeleteनित बहे और कविता सुनाती रहे ।
कभी सुनता क्या बुत भी इबादत कहीं
ReplyDeleteघण्टियाँ क्यों सदा घनघनाती रहे bahut sundar likha...dhanyawad
wah ji wah mazaa aa gaya.
ReplyDeletethanks.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM
बहुत ही सुंदर सुमन जी मन मै बस गई आप की यह कविता,
ReplyDeleteधन्यवाद
" bahut hi gaherai bhari aapki soch ko salaam ....aapne bahut hi bada sach badhiya tarah se pesh kiya hai "
ReplyDelete----- eksacchai { AAWAZ}
http://eksacchai.blogspot.com
चिड़ियों का चहचहाना जीवन की अभिव्यक्ति है, काश हम सब इसे महसूस करते रहें ! ऑंखें खोलने के लिए आभार सुमन भाई !
ReplyDeleteचिड़ियों का चहचहाना जीवन की अभिव्यक्ति है, काश हम सब इसे महसूस करते रहें ! ऑंखें खोलने के लिए आभार सुमन भाई !
ReplyDeleteभविष्य में आपको पढता रहूँ अतः आपका ब्लाग फालो कर रहा हूँ !
अब किन लफ़्ज़ों मे तारीफ़ करूँ …………………………हर पंक्ति लाजवाब है।
ReplyDeleteलौ थरथरा रही है बस तेल की कमी से।
ReplyDeleteउसपर हवा के झोंके है दीप को बचाना॥
हवा कितनी भी तेज हो लौ को तो बचाना ही होगा.
बहुत खूबसूरत गज़ल के लिये साधुवाद
प्यार सागर से यूँ है कि दीवानगी
ReplyDeleteमिल के खुद को ही नदियाँ मिटाती रहे
डालियाँ सूनी है पर सुमन सोचता
काश चिड़ियाँ यहाँ चहचहाती रहे
Behad sundar panktiyan!
बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बढ़िया लगा!
ReplyDeleteश्यामल जी
ReplyDeleteचिरंजीव भवः
वो घड़ी हर घड़ी याद आती रहे
प्यार सागर से यूं है कि दीवानगी
मिल के खुद को ही नदियाँ मिटाती रहें
आपकी की यह गजल मन पर घर कर गई
इस लिखने की आग को ठंढा मत होने देना
आशीर्वाद के साथ
आपकी गुड्डो दादी
जिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहा
ReplyDeleteराख बन के भी खुशबू लुटाती रहे
aapki bahut si sari rachnayen padhi maine aaj. sabd kam hain tareef ko .sir ji aapke lekhni ki to mai kayal ho gayi ....sadar naman aapke lekhni ko ..
कभी सुनता क्या बुत भी इबादत कहीं
ReplyDeleteघण्टियाँ क्यों सदा घनघनाती रहे
बुतपरस्ती की ऐसी आदत हो गयी कि इंसान की इंसानियत भी शहादत के कगार पर है
सुन्दर भाव की रचना
nayee mahaktee soch
ReplyDeletenayee..mahaktee huyee soch...khoob
ReplyDeleteवाह,सुन्दर शब्दाकंन किया है,आपने सच्ची भावनाओ का!
ReplyDeleteachchi lagi.
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