यकीन टूटते हर पल ये जमाना क्यूँ है?
खुशी से दूर ये दुनिया फिर सजाना क्यूँ है?
सभी को रास्ता जो सच का दिखाते रहते
रू-ब-रू हो ना आईना से बहाना क्यूँ है?
धुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते ही
हजारों लोगों को नित गंगा नहाना क्यूँ है?
इस कदर खोये हैं अपने में कौन सुनता है?
कहीं पे चीख तो कहीं पे तराना क्यूँ है?
बुराई कितनी सुमन में कभी न गौर किया
ऊँगलियाँ उठती हैं दूजे पे निशाना क्यूँ है?
श्यामल
ReplyDeleteचिरंजीव भावः
धुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते ही
हजारों लोगों को नित गंगा नहाना कयूँ है?
आपकी तो सारी गजल तो झकझोर शब्दों से भरपूर भावुक है काश सभी इसे समझें
खुशी से दूर सभी फिर ये ठिकाना क्यूँ है?
ReplyDeleteअमन जो लूटते उसका ही जमाना क्यूँ है?
बहुत सुंदर गजल जो दिल में ठिकाना बना लेती है !शुभ कामनाएं !
निश्चय ही उम्दा सोच ,हर इन्सान को अपनी कमियों को भी देखना चाहिए और उसे हर वक्त सुधारने का प्रयास भी करना चाहिए /
ReplyDeleteबुराई कितनी सुमन में कभी न गौर किया
ReplyDeleteऊँगलियाँ उठतीं हैं दूजे पे निशाना क्यूँ है?
Sadiyon raha yah chalan,
Ek hamhi sahi hain,
sara zamana galat kyun hai?
"धुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते ही
ReplyDeleteहजारों लोगों को नित गंगा नहाना क्यूँ है?"
बहुत बढ़िया !!
सभी को रास्ता जो सच का दिखाते रहते
ReplyDeleteरू-ब-रू हो ना आईना से बहाना क्यूँ है?
बहुत अच्छी लगी जी आप की रचना
बुराई कितनी सुमन में कभी न गौर किया
ReplyDeleteऊँगलियाँ उठतीं हैं दूजे पे निशाना क्यूँ है?
वाह बहुत सुन्दर ग़ज़ल है !
आप कबीर के उस दोहे को फिर से नए रंग में पेश किये हैं, जो की बहुत सुन्दर लग रहा है ! बधाई !
जबाब नहीं । हर शब्द चोट करता हुआ उतर गया ।
ReplyDeletesahi baat hain.
ReplyDeletethanks.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM
श्यामल जी आप लगातार लिखते जाए क्योंकि आप अच्छा लिख रहे हैं।
ReplyDeleteहमेशा की शानदार रचना।
ReplyDelete--------
पड़ोसी की गई क्या?
गूगल आपका एकाउंट डिसेबल कर दे तो आप क्या करोगे?
सभी को रास्ता जो सच का दिखाते रहते
ReplyDeleteरू-ब-रू हो ना आईना से बहाना क्यूँ है?
सच का आइना दिखाती रचना ।
हमेशा की तरह बढ़िया सुमन जी ।
Very Good...
ReplyDeleteइस कदर खोये हैं अपने में कौन सुनता है?
ReplyDeleteकहीं पे चीख तो कहीं पे तराना क्यूँ है?
बुराई कितनी सुमन में कभी न गौर किया
ऊँगलियाँ उठतीं हैं दूजे पे निशाना क्यूँ है?
....Yatharth ke dhratal par likhi saargarbhit rachna ke liye bahut dhanyavad.
दिल को छू गयी हर एक पंक्तियाँ! पर आपके कहने और मेरे पढ़ लेने भर से कुछ नहीं होने का..वक्त आ गया हैं...एक बदलाव लाने का...और ये काम आप लिखने वाले और हम पढने वालों को ही अर्ना होगा...एक बार फिर से कहूँगी .. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है और आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है|
ReplyDeletehar ek pankti ek seekh ka kaam kar rahi hai.. bahut hi badhiya lagi ye rachna Suman sir
ReplyDelete"धुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते ही
ReplyDeleteहजारों लोगों को नित गंगा नहाना क्यूँ है?"
धुल गए मैल खारापन न धुला
इसलिए गंगा में नहाना ही है
वैसे किस पंक्ति को अच्छा कहूँ किसको न .....लाजवाब है सारी की सारी पंक्तियाँ ...
बेहद सुन्दर भाव लिए आपने शानदार रूप से रचना प्रस्तुत किया है! लाजवाब! बहुत बहुत बधाई!
ReplyDeleteधुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते ही
ReplyDeleteहजारों लोगों को नित गंगा नहाना कयूँ है?
वाह!
इसी मजमून पर ग़ालिब का एक शेर याद आया -
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम इतने के बस पाक हो गए
सभी को रास्ता जो सच का दिखाते रहते
ReplyDeleteरू-ब-रू हो ना आईना से बहाना क्यूँ है?
कुशल चितेरे हैं आप तो
बेहतरीन गज़ल
sach men sundar hai..
ReplyDelete- vijay
sir apki yah kavita to atyant sundar hai.......
ReplyDeletesir apki yah kavita to atyant sundar hai.......
ReplyDeleteatyant sundar.....
ReplyDeletesir
bhaut bhavuk or yathartha panktiya...!!
ReplyDeleteधुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते ही
ReplyDeleteहजारों लोगों को नित गंगा नहाना क्यूँ है?
क्या बात कही....वाह....
सदैव की भांति सुन्दर manmohak rachna...
बहुत सुन्दर। बधाई स्वीकारें।
ReplyDeleteकौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
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