Wednesday, May 20, 2009

खिलौना

देख के नए खिलौने, खुश हो जाता था बचपन में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

चाभी से गुड़िया चलती थी, बिन चाभी अब मैं चलता।
भाव खुशी के न हो फिर भी, मुस्काकर सबको छलता।।
सभी काम का समय बँटा है, अपने खातिर समय कहाँ।
रिश्ते नाते संबंधों के, बुनते हैं नित जाल यहाँ।।
खोज रहा हूँ चेहरा अपना, जा जाकर दर्पण में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

अलग थे रंग खिलौने के, पर ढंग तो निश्चित था उनका।
रंग ढंग बदला यूँ अपना, लगता है जीवन तिनका।।
मेरे होने का मतलब क्या, अबतक समझ न पाया हूँ।
रोटी से ज्यादा दुनियाँ में, ठोकर ही तो खाया हूँ।।
बिन चाहत की खड़ी हो रहीं, दीवारें आँगन में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

फेंक दिया करता था बाहर, टूटे हुए खिलौने।
सक्षम हूँ पर बाहर घर के, बिखरे स्वप्न सलोने।।
अपनापन बाँटा था जैसा, वैसा ना मिल पाता है।
अब बगिया से नहीं सुमन का, बाजारों से नाता है ।।
खुशबू से ज्यादा बदबू, अब फैल रही मधुबन में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

16 comments:

मीनाक्षी said...

यह निराशा का भाव तभी आता है जब हम बदले मे कुछ पाने की चाहत करते हैं...एक बार बस देने का भाव ही मन मे आ जाए तो यह उदासी और निराशा का भाव गायब हो जाता है ....

SWAPN said...

wah suman ji aap blog jagat men suman ki tarah mahak rahe hain.


फेंक दिया करता था बाहर टूटे हुए खिलौने।
सक्षम हूँ पर बाहर बैठा बिखरे स्वप्न सलोने।।
अपनापन बाँटा था जैसा वैसा ना मिल पाता है।
अब बगिया से नहीं सुमन का बाजारों से नाता है ।।
खुशबू से ज्यादा बदबू अब फैल रही मधुबन में।
बना खिलौना आज देखिये अपने ही जीवन में।।

behatareen rachna ke liye badhai. wah.

AlbelaKhatri.com said...

bhaiji.....khilaune k madhyam se bachpan ki maasoom laparwahi aur aaj ki sadosh dincharya ko aapne bakhoobi shabdchitra k roop me geet bana kar prastut kiya hai..
AAPKO HARDIK BADHAI

दिगम्बर नासवा said...

सुमन जी
आज कविता में कुछ निराशा का भाव नज़र आ रहा है............
जीवन तो अपने आप में खिलौना ही है...........ऊपर वाले के हाथ में..........आपका काव्य सुन्दर है..........हमेशा की तरह

श्यामल सुमन said...

मीनाक्षी जी और दिगम्बर भाई,

बात मेरे निराशा की नहीं अपितु समाज में घटित सच्ची घटनाएँ जब भावनाओं को उद्वेलित करती है तो ऐसी पंक्तियाँ स्वतः निकल आतीं हैं। कहते हैं - "साहित्य वैयक्तिक अनुभूति की निर्वैयक्तिक प्रस्तुति है।" फिर भी -

शुक्रिया आपका आपके प्यार का,
याद करते रहें और गाता रहूँ।
भावना आपकी शब्द भी आपके,
मैं पिरोकर उसे ही सुनाता रहूँ।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

संध्या आर्य said...

sundar abhiwykti

Kiran Sindhu said...

मेरे विचारों से सहमत होने के लिए धन्यवाद. आपकी कविता पढ़ी, बहुत अच्छी लगी आपकी रचना.

surya goyal said...

सुमन जी बधाई, आपके पूरे ब्लॉग का चक्कर काट कर पाया की कितनी सजगता से आपने अपनी बात को शब्दों में पिरो कर कविता बना दी . फर्क सिर्फ इतना है की हम इन्ही शब्दों से गुफ्तगू करते है . आपका भी मेरे ब्लॉग पर स्वागत है . www.gooftgu.blogspot.com

रंजना said...

क्या कहूँ....लाजवाब !!! बहुत बहुत सुन्दर !!!

सुप्रतिम बनर्जी said...

बहुत ख़ूब।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

खिलौने ख़ुशी देते हैं जब तक चाहो. खिलौने भी उदास होते हैं गर ऐसा चाहो. खिलौने आखिर खिलौने होते हैं.

Priya said...

फेंक दिया करता था बाहर टूटे हुए खिलौने।
सक्षम हूँ पर बाहर बैठा बिखरे स्वप्न सलोने।।
अपनापन बाँटा था जैसा वैसा ना मिल पाता है।
अब बगिया से नहीं सुमन का बाजारों से नाता है
.
........

These are the best lines of poetry...mere hisaab se

गौतम राजरिशी said...

अहा....बहुत सुंदर गीत !
इस मिस्‍रे पे सब निछावर "अब बगिया से नहीं सुमन का बाजारों से नाता है"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

नये खिलौने पाकर के,
खुश हो जाता था बचपन में।
अब मैं नये खिलौने लाता,
निज बच्चों के जीवन में।।

स्वप्न मंजूषा शैल said...

मेरे होने का मतलब क्या अबतक समझ न पाया हूँ।
रोटी से ज्यादा दुनियाँ में ठोकर ही तो खाया हूँ।।
बिन चाहत की खड़ी हो रहीं दीवारें आँगन में।
बना खिलौना आज देखिये अपने ही जीवन में।।


बहुत ही खुबसूरत और हृदयस्पर्शी विचार है. बधाई स्वीकारें
स्वप्न मंजूषा

Babli said...

आपकी कविता एक से बढकर एक है! बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!