Tuesday, August 4, 2009

आकांक्षा

ज्ञान का दीप जलाना मुश्किल,
पेट की आग बुझाना मुश्किल।
सर झुकाते रहे हैं बर्षों से,
शान से सर भी उठाना मुश्किल।

जगी नव-चेतना जो रंग नया लायेगी।
तीरगी से ही सही रश्मि निकल आयेगी।।

किसने अस्मत हमारी है लूटी,
हमारी मिल्लतें कहाँ टूटी?
मिला स्वराज सिर्फ कहने को,
अबतलक दासता नहीं छूटी।

करेंगे कोशिशें जो मुश्किलें हँटायेगी।
तीरगी से ही सही रश्मि निकल आयेगी।।

हमारी सोच में ही अनबन है,
बिना सूकून के क्या जीवन है?
अलग है वर्ण और बोली भी,
कई सुमन हैं एक उपवन है।

हमारी एकता ही रास्ता बनायेगी
तीरगी से ही सही रश्मि निकल आयेगी।।

23 comments:

जीवन सफ़र said...

हमारी एकता ही रास्ता बनायेगी
तीरगी से ही सही रशमि निकल आयेगी।।
बहुत अच्छी रचना सच कहा आपने आशा ही जीवन है!

M VERMA said...

हमारी एकता ही रास्ता बनायेगी
तीरगी से ही सही रशमि निकल आयेगी।।
जी हाँ! एकमात्र रास्ता तो एकता से ही होकर जाती है.
बहुत खूबसूरत भाव और प्रेरक रचना

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

हमारी एकता ही रास्ता बनायेगी ...

सही लिखा है | सुन्दर रचना |

Mithilesh dubey said...

किसने अस्मत हमारी है लूटी,
हमारी मिल्लतें कहाँ टूटी?
मिला स्वराज सिर्फ कहने को,
अबतलक दासता नहीं छूटी।

सुन्दर रचना। बधाई

Nirmla Kapila said...

जगी नव-चेतना जो रंग नया लायेगी।
तीरगी से ही सही रशमि निकल आयेगी।
कितनी सार्थक और सुन्दर बात कही है आशा है तो सब कुछ है सकारात्मक सोच के लिये प्रेरित करती बेहतरीन रचना आभार्

रश्मि प्रभा... said...

bahut khoob

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

ज्ञान का दीप जलाना मुश्किल,
पेट की आग बुझाना मुश्किल।
सर झुकाते रहे हैं बर्षों से,
शान से सर भी उठाना मुश्किल।

जगी नव-चेतना जो रंग नया लायेगी।
तीरगी से ही सही रशमि निकल आयेगी।।

सुन्दर भावों से सजी-सँवरी कविता के लिए बधाई।

हिमांशु । Himanshu said...

"हमारी एकता ही रास्ता बनायेगी
तीरगी से ही सही रशमि निकल आयेगी।।"

इन पंक्तियों ने खासा प्रभावित किया । आभार ।

Babli said...

अत्यन्त सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना बहत अच्छी लगी!

संजीव गौतम said...

आज के दिन की शुरूआत इस उर्जावान रचना से. बहुत खूब सर

vandana said...

atyant sundar bhav.

BrijmohanShrivastava said...

अंतिम पद में सार |हमारी सोच में ही अनवन है ,उपवन एक है मगर सुमन अनेक है ,कविता भी पूरी रचनाकार का तखल्लुस भी और एकता की बात भी |अति उत्तम

अर्चना तिवारी said...

सुन्दर रचना। बधाई

AlbelaKhatri.com said...

bahut bole toh bahut hi badhiya hai ji.............
anand aa gaya........
badhaai !

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

सही विचार जी। विशेषत: मेरे नाम से ही प्रारम्भ!

चंदन कुमार झा said...

प्रेरक रचना...आभार.


गुलमोहर का फूल

woyaadein said...

ऊर्जा एवं प्रेरणा से परिपूर्ण आपकी यह रचना,
जिसके मूल में है सबके हित की संकल्पना.......

साभार
हमसफ़र यादों का.......

श्यामल सुमन said...

आप सबके स्नेह समर्थन का आभारी हूँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

विनोद कुमार पांडेय said...

एकता से ही हम अपने वर्चस्व को एक नयी पहचान दे सकते है..
आत्मविश्वास बढ़ाने वाली कविता...

GarmaGaram said...

kamaal hai suman ji... ye sach hai.. achha hai...

मिथिलेश श्रीवास्तव said...

अच्छी रचना, एक गुजारिश है श्यामल जी, वर्तनी की अशुद्धियां न करें!

श्यामल सुमन said...

मिथिलेश जी - धन्यवाद। रशमि को मैंने रश्मि कर दिया है। दरअसल "की बोर्ड" पर संयुक्ताक्षर के लिए प्रयोग में आनेवाले "की" कुछ ठीक से काम नहीं कर रहा है। अतः यह गलत टाइप हो गया। फिर भी गलती को ओर इशारा करने के लिए आभारी हूँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

'अदा' said...

ज्ञान का दीप जलाना मुश्किल,
पेट की आग बुझाना मुश्किल।
सर झुकाते रहे हैं बर्षों से,
शान से सर भी उठाना मुश्किल।
sahi vichar prakat karti hui kavita..
bhaiya..bahut hi saarthak, sajeev aur sateek...

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