Thursday, October 21, 2010

बदलाव

याद करूँ बचपन को जब जब, बेड़ी लगती पाँव में।
जो कुछ मैंने शहर में देखा, दिखते हैं अब गाँव में।।

घूँघट में सिमटी दुल्हन अब बीते दिन की बात है।
जीन्स पेंट, मोबाइल, टी०वी०, गाड़ी भी सौगात है।
मन की बातें, अपना सुख-दुख बतियाने का समय नहीं,
महिलायें भी काम पे जाती दिन है चाहे रात है।
समाधान सामाजिक अब ना होता पीपल छाँव मे।
जो कुछ मैंने शहर में देखा, दिखते हैं अब गाँव में।।

लोग सहजता से ना मिलते बाजारों की भाषा है।
खुशी के बदले अब चेहरों पे छायी बहुत निराशा है।
विज्ञापन का रहन-सहन पे है प्रभाव बढ़ता जाता,
चाहत एक हुई पूरी तो दूजे की प्रत्याशा है।
चकित सुमन बदलाव देखकर रहा गाँव न ठाँव में।
जो कुछ मैंने शहर में देखा, दिखते हैं अब गाँव में।।

13 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

आपकी पीड़ा सच है, सब बदल रहा है।

Anonymous said...

याद करूँ बचपन को जब जब बेड़ी लगती पाँव में।
जो कुछ मैंने शहर में देखा वो दिखते हैं गाँव में।।

दर्द भरी कविता बहुत ही जी कर लिखी


जा हवा तू रास्ता ले अपना
किस्मत है मेरी जी के तडपना

ehsas said...

such kah rahe hai aap. par badlao to prakriti ka niyam hai. agar badlao nahi hota to hum abhi bhi aadim samay mea ji rahe hote.

चन्द्र कुमार सोनी said...

बदलाव तो प्रकृति का नियम हैं जी.
हमारा फ़र्ज़ उसे (बदलाव को) ख़ुशी-ख़ुशी, सच्चे दिल से स्वीकारने का हैं.
पर हाँ, नकारात्मक बदलावों को यथासंभव रोकने-सुधारने का दायित्व भी हमारा अपना ही हैं.
बहुत बेहतरीन,
धन्यवाद.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

गुड्डोदादी said...

घूँघट में सिमटी दुल्हन अब बीते दिन की बात है।
जीन्स पेंट, मोबाइल, टी०वी०, गाड़ी भी सौगात है।
मन की बातें, अपना सुख-दुख बतियाने का समय नहीं,
महिलायें भी काम पे जाती दिन है चाहे रात है।

दुःख पीड़ा का वर्णन |
बहुत चित्र देखे
क्या कोई नेता या धनी वर्ग समझेगा


ऐसे चित्र देख दिल दहल जाता हैं कहाँ तो कॉमनवेल्थ के गेम्स की वाह वाही और दूसरी ओर कष्टप्रद जनता

काजल कुमार Kajal Kumar said...

धीरे-धीरे गांव सिमट जाएंगे...

Anonymous said...

श्यामल जी
आशीर्वाद

लोग सहजता से न मिलते बाजारों की भाषा है।
खुशी के बदले अब चेहरों पर छायी बहुत निराशा है।
क्या लिखूं दर्द न जाने कोय

kshama said...

लोग सहजता से न मिलते बाजारों की भाषा है।
खुशी के बदले अब चेहरों पर छायी बहुत निराशा है।
विज्ञापन का सहन-सहन पर है प्रभाव बढ़ता जाता,
चाहत एक हुई पूरी तो दूजे की प्रत्याशा है।

Badi sahaj,sundartaa se aapne ye baat kah dalee...ekdam sahi hai! Aisahi ho gaya hai...

वन्दना said...

बिल्कुल सटीक बात कही है।

रंजना said...

शब्दशः सत्य कहा आपने...शत प्रतिशत सहमत हूँ...और सचमुच यह बदलाव बड़ी पीड़ा देती है...

अतिसुन्दर इस रचना के माध्यम से आपने विसंगतियों को बखूबी बयां किया है...

संजय भास्कर said...

उम्दा रचना... बधाई.

गुड्डोदादी said...

आपकी कविता पढ़ी बार बार बदलाव
हम ना भारत के रहे नहीं विदेश के
क्या करें कोई तो दीजीये सुझाव

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर रचना!
--
मंगलवार के साप्ताहिक काव्य मंच पर इसकी चर्चा लगा दी है!
http://charchamanch.blogspot.com/

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