Friday, January 4, 2013

नयी सुबह की आस


कोई मस्त है, कोई पस्त है
चेहरे की शिकन देखकर
लगता है कि त्रस्त है
मजे की बात है कि
फिर भी हरदम व्यस्त है
ठीक उसी तरह जैसे
नयी सुबह की आस जगाकर
प्रतिदिन होता सूरज अस्त है।

13 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

समय नियत दे सूर्योदय में, व्यर्थ किये पर हँसता वह।

शारदा अरोरा said...

sach kaha....vyst hai , ast hai...

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

ओ सुबह कभी तो आयेगी !

Rohitas ghorela said...

वाह ...बेहतरीन पोस्ट

recent poem : मायने बदल गऐ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (06-01-2013) के चर्चा मंच-1116 (जनवरी की ठण्ड) पर भी होगी!
--
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि किसी पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
सादर...!
नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ-
सूचनार्थ!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रविकर said...

शुभकामनायें-

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

प्रभावशाली !!
जारी रहें !!

आर्यावर्त बधाई !!

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

प्रभावी उम्दा प्रस्तुति,,,,

recent post: वह सुनयना थी,

Kalipad "Prasad" said...

बहुत सुन्दर
नई पोस्ट :" अहंकार " http://kpk-vichar.blogspot.in

Reena Maurya said...

अति सुन्दर रचना..
:-)

Reena Maurya said...

अति सुन्दर रचना..
:-)

गुड्डोदादी said...

लगता है कि त्रस्त है
मजे की बात है कि
फिर भी हरदम व्यस्त है
(वो सुबह कभी तो आएगी )

Vinay Prajapati said...

अति सुंदर कृति
---
नवीनतम प्रविष्टी: गुलाबी कोंपलें

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