Monday, May 25, 2015

लथपथ सर से पाँव तक

गरमी से तन जल रहा, जल बिन सब बेचैन।
पलक पसीना चू रहा, लड़ना मुश्किल नैन।।

निर्धनता के सामने, छोटे हैं सब रोग।
लू, ठंढक, बरसात में, मरते ऐसे लोग।।

लथपथ सर से पाँव तक, तुरत नहाने बाद।
मोल पसीने का बहुत, गरमी से बर्बाद।।

धीरे धीरे उम्र संग, बढता नित संसार।
मंहगाई, गरमी बढी, तेज बहुत रफ्तार।।

गरमी में ही आम को, मिले आम सौगात।
गरमी से गर जूझना, कर ले ठंढी बात।।

हरियाली जितनी अधिक, कम सूरज को क्रोध।
जग में सूरज जब तलक, है जीवन का बोध।।

घडा हृदय से ठंढ क्यों, उत्तर सुन लो भाय।
माटी-तन माटी मिले, गरमी क्यों दिखलाय।।

ऐ सूरज बारिश बुला, आम लोग बेहाल।
भींगे सभी फुहार में, हो धरती खुशहाल।।

जंगल, पर्वत, पेड़ संग, कटे सुमन के बाग।
सूरज का गुस्सा उचित, उगल रहा है आग।।

2 comments:

रचना दीक्षित said...

एक एक शब्द और बात सोलह आने सच

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

सुन्दर प्रस्तुति

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