Saturday, June 3, 2017

माथा अपना फोड़ रहे हैं

इक दूजे को जोड़ रहे हैं
कुछ को लेकिन छोड़ रहे हैं

लाख बुझाने पर ना समझे
फिर उनसे मुँह मोड़ रहे हैं

जीवन में जो प्रेम सुधा रस
निशि दिन उसे निचोड़ रहे हैं

कदर नहीं रिश्तों की जिनको
रिश्ता, उनसे तोड़ रहे हैं

जो चूके, फिर वही सुमन से
माथा अपना फोड़ रहे हैं

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-06-2017) को
"प्रश्न खड़ा लाचार" (चर्चा अंक-2640)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Anonymous said...

Hi there, the whole thing is going fine here and ofcourse every one is sharing data,
that's really excellent, keep up writing.

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हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!