साधो! किसकी कौन सुने?
हर कोई अपने अनुभव से, अपना नीड़ बुने।।
साधो! किसकी -----
साधु - संत भरे हैं ज्ञानी, पर कुछ दिखते हैं अभिमानी।
लोक - लाज से बाहर जो भी, करते रहते हैं नादानी।
सच्चे - संत अभी चिन्ता में, अपना माथ धुने।।
साधो! किसकी -----
मानव - मूल्यों की रखवाली, तब संभव आए खुशहाली।
दुख में जहाँ पड़ोसी होंगे, फिर क्या होली क्या दिवाली?
स्वारथ मूल सभी उलझन के, रस्ता कौन चुने??
साधो! किसकी -----
कहीं पे काँटे कहीं फूल है, प्रेम जगत का सृजन-मूल है।
चींटी तो शक्कर ले चलती, हाथी के सर भरी धूल है।
कल सबका हो कैसे बेहतर, मन में सुमन गुने।।
साधो! किसकी -----




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