Sunday, March 14, 2010

बस माँगे अधिकार

कैसे कैसे लोग से, भरा हुआ संसार।
बोध नहीं कर्तव्य का, बस माँगे अधिकार।।

कहने को आतुर सभी, पर सुनता है कौन।
जो कहने के योग्य हैं, हो जाते क्यों मौन।।

आँखों से बातें हुईं, बहुत सुखद संयोग।
मिलते कम संयोग यह, जीवन का दुर्योग।।

मैं अचरज से देखता, बातें कई नवीन।
मूरख मंत्री के लिए, अफसर बहुत प्रवीण।।

जनता बेबस देखती, जन-नायक है दूर।
हैं बिकते अब वोट भी, सुमन हुआ मजबूर।।

19 comments:

  1. व्यस्तता के बावजूद बढ़िया रचना और वो भी सुंदर संदेशों से लबरेज...धन्यवाद सुमन जी

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  2. मैं अचरज से देखता बाते कई नवीन।
    मूरख मंत्री के लिऐ अफसर बहुत प्रवीण।।

    सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

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  3. आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

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  4. कहने को आतुर सभी पर सुनता है कौन।
    जो कहने के योग्य है हो जाते क्यों मौन।।

    आँखों से बातें हुईं बहुत सुखद संयोग।
    मिलते कम संयोग यह जीवन का दुर्योग।।

    मैं अचरज से देखता बाते कई नवीन।
    मूरख मंत्री के लिऐ अफसर बहुत प्रवीण।।
    वाह वाह सुमन जी लाजवाब। बधाई इस रचना के लिये।

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  5. कैसे कैसे लोग से भरा हुआ संसार।
    बोध नहीं कर्त्तव्य का बस माँगे अधिकार।।
    यही तो बिडम्बना है
    सुन्दर रचना

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  6. बहुत सुंदर भाव जी, मजे दार
    धन्यवाद

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  7. shyamal jee
    sada sukhi raho
    aankhon se baatain huee
    bahoot sukhad sunyog
    milte kam sanyog yeh
    jeevan ka duruyog
    wah kya likh diya aapne
    kuchh shbd meri shbdkosh me bhej deejeey
    aashirvaad ke sath
    aapki guddo dadi

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  8. अच्छा है सुमन जी...

    अब आ गए हैं तो और कवितायें पढने को मिलेंगी ...

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  9. परिस्थितियों को बहुत हीं सुन्दर बयां किया है आपने । अच्छी रचना । आभार

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  10. बेहतरीन। लाजवाब।

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  11. sabhi dohe ek se badhkar ek hai.
    main bhi soch rahi thi ki itne din se aap hain kahan.
    agar fursat mile to hamare blog par bhi aaiyega.
    http://vandana-zindagi.blogspot.com
    http://redrose-vandana.blogspot.com
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  12. जनाब, अधिकार मांगने से नहीं, छीनने से मिलते हैं. excellent.
    धन्यवाद.
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  13. मैं अचरज से देखता बाते कई नवीन।
    मूरख मंत्री के लिऐ अफसर बहुत प्रवीण।।

    एकदम सही कहा भैया...एकदम सही...
    सदैव की भांति सीखने सोचने को खुराक देती अतिसुन्दर रचना...

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  14. आपकी ये गज़ल बहुत ही अच्छी लगी । खास कर ये
    कहने को आतुर सभी पर सुनता है कौन।
    जो कहने के योग्य है हो जाते क्यों मौन।।

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  15. बहुत बढ़िया रचना सुमन जी आभार...

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