Wednesday, May 14, 2025

साधो! किसकी कौन सुने?

साधो! किसकी कौन सुने?
हर कोई अपने अनुभव से, अपना नीड़ बुने।।
साधो! किसकी -----

साधु - संत भरे  हैं ज्ञानी, पर कुछ दिखते हैं अभिमानी। 
लोक - लाज  से बाहर  जो भी, करते  रहते हैं नादानी।
सच्चे - संत अभी चिन्ता में, अपना माथ धुने।।
साधो! किसकी -----

मानव - मूल्यों की रखवाली, तब संभव आए खुशहाली।
दुख में जहाँ पड़ोसी होंगे, फिर क्या होली क्या दिवाली?
स्वारथ मूल सभी उलझन के, रस्ता कौन चुने??
साधो! किसकी -----

कहीं पे काँटे कहीं फूल है, प्रेम जगत का सृजन-मूल है।
चींटी तो शक्कर  ले  चलती, हाथी  के  सर भरी धूल है।
कल सबका हो कैसे बेहतर, मन में सुमन गुने।।
साधो! किसकी -----

No comments:

Post a Comment