Tuesday, May 26, 2009

मच्छड़ का फिर क्या करें

मैंने पूछा साँप से,  दोस्त बनेंगे आप।
नहीं महाशय ज़हर में,  आप हमारे बाप।।

कुत्ता रोया फूटकर,  यह कैसा जंजाल।
सेवा नमकहराम की,  करता नमकहलाल।।

जीव मारना पाप है,  कहते हैं सब लोग।
मच्छड़ का फिर क्या करें,  फैलाता जो रोग।।

दुखित गधे ने एक दिन,  छोड़ दिया सब काम।
गलती करता आदमी,  लेता मेरा नाम।।

बीन बजाये नेवला,  साँप भला क्यों आय।
जगी न अब तक चेतना,  भैंस लगी पगुराय।।

नहीं मिलेगी चाकरी, नहीं मिलेगा काम।
न पंछी बन पाओगे,  होगा अजगर नाम।।

गया रेल में बैठकर,  शौचालय के पास।
जनसाधारण के लिये,  यही व्यवस्था खास।।

रचना छपने के लिये,  भेजे पत्र अनेक।
सम्पादक ने फाड़कर,  दिखला दिया विवेक।।

26 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

मैंने पूछा साँप से दोस्त बनेंगे आप।
नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप।।
बाप रे बाप !

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भई वाह्! कितना सच लिखा है आपने....बहुत ही बढिया.

"लोकेन्द्र" said...

वाह शमामल सुमन जी.....
क्या व्यंग छेड़े हैं आपने.........

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सांप ज़हर आजकल इंसान से मांगता है.

श्यामल सुमन said...

ठीक कहा आपने काजल कुमार जी। आपकी बात पर एक शायर की पंक्तियाँ याद आ गयी-

साँपों के मुकद्दर में वो जहर नहीं होता।
इन्सान अदावत पे जो जहर उगलता है।।

आप सबको समर्थन के लिए शुक्रिया।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Priya said...

good one! well mannered and polished saanp

Udan Tashtari said...

सटीक- यथार्थ पर आधारित दोहे!

karuna said...

व्यंग के सटीक प्रयोग द्वारा आपने आज के मानव पर लाजबाब कटाक्ष किया है ,जो काबिले तारीफ है |

AlbelaKhatri.com said...

HA HA HA HA
gazab bhayo rama gazab bhayo re...
dohe baanch kar anand aagya saheb
LAKH LAKH BADHAI

ज्योति सिंह said...

harek line jabardast padte -padte hansti rahi .majedar vyang .hansya kavi sammelan ki yaad aa gayi .wah-wah karne ka maan hota raha .

woyaadein said...

यथार्थ पर व्यंग्य बहुत अच्छा लगा. सार्थक व्यंग्य.....शुभकामनाएं...

साभार
हमसफ़र यादों का.......

स्वप्न मंजूषा शैल said...

मैंने पूछा साँप से दोस्त बनेंगे आप।
नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप।।

क्या बात है !!
बिलकुल सटीक दोहे लिखे हैं आपने
बधाई ही बधाई

मुकेश कुमार तिवारी said...

श्यामल जी

खूब लिखे हैं दोहे, बड़ी दोहरी मार मारी है।

गया रेल में बैठकर शौचालय के पास।
जनसाधारण के लिये यही व्यवस्था खास।।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Nirmla Kapila said...

बहुत बडिया ब्लोग है आभार्

दिगम्बर नासवा said...

मैंने पूछा साँप से दोस्त बनेंगे आप।
नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप

वाह सुमन जी
क्या लाजवाब दोहे..........आज के सन्दर्भ में बिलकुल सही उतारते हैं .......... हर दोहे में अलग ही मिजाज़ नज़र आता है...मुंह से वाह...वाह...निकलता है

geetashree said...

श्यामल जी, पहली बार देखा. बहुत दिलचस्प है व्यंग्यात्मक कविताओं की दुनिया. अब नियमित देखते रहना पड़ेगा कि कहीं कुछ छूट ना जाए.वैसे सच भी है.सांप इनसान से सामना करने से हमेशा भागता है.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह भाई सुमन जी इस व्यग्याभिव्यक्ति के लिये विशिष्ट बधाई... वाह

रंजना said...

वाह वाह वाह !!!

हर दोहा मन मन भर का.....बहुत बहुत आनंद आया पढ़कर...क्या खूब लिखा है आपने..

Shama said...

Sahee kehete hain...Marathi bhashaki behad prasiddh kaviyatri,(Bahina bai Chaudhary) jo nirakshar theen..keh gayeen,"are aadamee, tujhse bichhu, saanp behtar, ki uske kaateko utaare mantar"!
Maine ye swair anuwad kiya hai..!
Inkee rachnaon pe kayiyon ne Phd.prapt kar lee hai..insaan ke bhatakte "man" ko leke rachee kavitayen to aisee gazab hain! Shayadhee kisee any ne nisargse itna seeekha ho..ek aurat jisne ta-umr khetonme kaam kiya..Khandesh ke bahar kaheen gayee nahee...par kya kamal kar dikhaya..
Aapke dohe padhe to unki barbas yaad aa gayee.."sansaar" is wishayko lekebhee unhon ne anmol rachnayen racheen..
Ve likh nahee sakti theen....isliye,jo unke poteko yaad rahaa, usne prakashit kiya.
Lataji ne unke kuchh geet gayen hain.

Waise, aap wyang ke roopme is qadar saty likh gaye hain...! Kya kehne..!Ye zaroor kahungi,ki, aajke maanav pe nahee..sadiyon se manav jaatee aiseehee rahee hai..!

Aapki tippaneeke liye shukrguzaar hun..maine kayi tareeqon se "maatru" likhneki koshish kee..lekin jaisa aap chahte hain, safal nahee huee..mujhe bata sakenge, ki, apne iske "hijje" kaise kiye?Aabharee rahungi!

प्रशांत said...

बहुत बढ़िया , आज पहली बार इस गली आया और पहली बार मे ही "दिल" दे दिया .

Shama said...

Pata nahee, kyon, baar,baar comment post karneme "error" dikhaya ja raha hai!

Ye hai meree e-mail ID:

shamakavya@gmail.com

Aapki tahe dilse shukrguzar hun!

Open ID pebhi comment post karnekee koshish kee, nahee hua!

Snehadar sahit
Shama

महामंत्री - तस्लीम said...

बहुत सुंदर दोहे। खासकर पहला तो दिल के भीतर उतर गया। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

priyesh said...

kya vyang kiya hai dohe k madhyam se,bahut hi sarahaniy doha hai. badhayi aap ko.

Pyaasa Sajal said...

गया रेल में बैठकर शौचालय के पास।
जनसाधारण के लिये यही व्यवस्था खास।।

ghazab ghazab ke udaaharn uthaaye hai...mazaa aa gayaa padhke...aapki baato ko zehan me utaar bhi liyaa :)


www.pyasasajal.blogspot.com

vandana said...

vah sir bahut hi badiya dohe hai ..padhkar bahut achha laga

jayanti jain said...

great satire

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