Thursday, May 28, 2009

पागल

मै हो न जाऊँ पागल पागल की देख मस्ती
दुनियाँ मुझे क्यों लगती पागल की एक बस्ती

गड़बड़ था मेरा माथा लाये इलाज करने
आये थे साथ लेकर बस्ती की नेक हस्ती

जिस दिन से मुझको छोड़ा फिर लौट के न आये
पागल को मिल रही अब पागल की सरपरस्ती

अपनों का साथ छूटा पागल बने हैं अपने
जहाँ मौत में है जीवन और जिन्दगी है सस्ती

कहता सुमन है कुछ कुछ पागल सभी जहाँ में
कहना बहुत है मुश्किल डूबेगी किसकी कश्ती

19 comments:

Suman said...

bahut khoob navrashi ji bahut badhiya kikhte hai aap padh kar man prashann ho gaya .kahin pe nigahein -kahin par nishana

suman

श्यामल सुमन said...

पता नहीं सुमन जी क्या कहना चाह रहे हैं? navrashi ji और kahin pe nigahein -kahin par nishana का अर्थ कम से कम मेरी समझ में नहीं आया। फिर भी खुशी है कि कम से कम वो आये तो

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

PN Subramanian said...

समानुभूति में ही संवेदनशीलता निहित है. बहुत सुन्दर रचना.

प्रीतीश बारहठ said...

यह तो समानुभूति नहीं है, सहानुभूति ही है सुमन जी। आपके विचार स्तुत्य हैं लेकिन महान शब्दों के माध्यम से ही महान नहीं हुआ जाता। समानुभूति तो सामान परिस्थिति में पड़ने पर ही हो सकती है, किसी मनोविज्ञानी से इसका निर्धारण करवा कर देख लीजिये। सहानुभूति के थोडे ऊँचे स्तर(जो भी वास्तव में कितना है!), जो व्यक्ति सापेक्ष है, से समानुभूति का धोखा मत खाइये। पुन: यही कहूँगा कि आपके विचार स्तुत्य हैं, जो आदर्श कल्पना की है उसके लिये अभी अपने को और मांजिये।

AlbelaKhatri.com said...

ye maal zara hat k hai
anand k saath saath anoothapan bhi hai
badhai

अखिलेश्‍वर पांडेय said...

भाई श्‍यामल जी,
सुंदर विवेचना। बधाई।

woyaadein said...

मेरे विचार में यह संसार एक पागलखाना है, और हम सभी अपनी-अपनी धुन में पागल.....बस इतनी सी बात हर कोई समझ जाए तो सहानुभूति नाम का शब्द ही शेष नहीं रहेगा और सम्स्तिथि के साथ समानुभूति अपने आप ही आ जायेगी....हाँ लेकिन पागलपन सकारात्मक होना चाहिए....ना कि उस तरह का जैसा हमने हाल ही में पहले वियना और फिर पंजाब में देखा....इस बारे में आप मेरे भाव विस्तृत रूप में मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते है.....पता नीचे दिया हुआ है.

साभार
हमसफ़र यादों का.......

Udan Tashtari said...

जिस दिन से मुझको छोड़ा फिर लौट के न आये।
पागल को मिल रही अब पागल की सरपरस्ती।।


--भूमिका खूब बाँधी-भावनाऐं समझी जा सकती हैं.

अल्पना वर्मा said...

यह वाकई दुखद स्थिति है..पागलखाना हो या लम्बे समय से चल रहे रोगी..और असहाय वृद्ध ..परिवार वाले इन्हें वापस लेने नहीं आते..बेहद दुखद सामजिक स्थिति है..हमारे समाज में कहीं तो कुछ नैतिक मूल्यों में कमी है..जो ऐसी नोबत आ जाती है.
-मर्मस्पर्शी संस्मरण .
-कविता के द्वारा आप ने भावों को खूब अभिव्यक्त किया है-
अपनों का साथ छूटा पागल बने हैं अपने।
जहाँ मौत में है जीवन और जिन्दगी है सस्ती।।
---------

SWAPN said...

कहता सुमन है कुछ कुछ पागल सभी जहाँ में।
कहना बहुत है मुश्किल डूबेगी किसकी कश्ती।।

bahut hi hridaysparshi marmik rachna, alpna ji ne kaha main usse sahmat hun.

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कमाल की विवेचना की है।

अक्षय-मन said...

जी बहुत ही रोमांच से भरी हुई रचना है आपकी....
आपके चहरे से आपकी रचना झलकती है....

जहाँ मौत में है जीवन और जिन्दगी है सस्ती।।
ये पंक्तियाँ कमाल की हैं
बहुत ही लुभावनी......
अक्षय-मन

रंजना said...

क्या कहा जाय....कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है यह....

आप भावुक ह्रदय हैं,आपने उनके दर्द को सिद्दत्त से महसूश किया,काश इसका कुछ अंश भी उनके तथाकथित अपने अनुभूत कर पाते.....

बहुत ही सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना हेतु आपका बहुत बहुत आभार.

रश्मि प्रभा... said...

अपनों का साथ छूटा पागल बने हैं अपने।
जहाँ मौत में है जीवन और जिन्दगी है सस्ती।।
......waah

Manish Kumar said...

जिस दिन से मुझको छोड़ा फिर लौट के न आये।
पागल को मिल रही अब पागल की सरपरस्ती।।

jo aapne mehsoos kiya dekh kar use sahajta se pannon par la sake hain.

दिगम्बर नासवा said...

जिस दिन से मुझको छोड़ा फिर लौट के न आये।
पागल को मिल रही अब पागल की सरपरस्ती।।

आपने दिल से उस पीडा को समझा है............अभिव्यक्त भी किया है अपनी रचना में और पूरी इमानदारी के साथ.........

गर्दूं-गाफिल said...

सहानुभूति में सच्चाई के अतिरिक्त नाटकीयता भी हो सकती है जो कभी कभी सामाजिक बन्धन में मजबूरीवश प्रदर्शित किया जाता है। लेकिन समानुभूति में यह संभव नहीं। क्योंकि समानुभूति में, कुछ देर के लिए ही सही, वह पीड़ित पात्र बन के जीना पड़ता है।

मै हो न जाऊँ पागल पागल की देख मस्ती।
दुनियाँ मुझे क्यों लगती पागल की एक बस्ती।

श्यामल जी ,

सत्य ही समानुभूति में डूबे पात्र में ही इतनी सम्वेदना सम्भव है . इस गज़ल के नीचे लिखे दोहे भी गम्भीर पीडा की प्रतिध्वनी सुनाई देते हैं . समानुभूति की सम्वेदना का प्रसार निरंतर करते रहे. विश्व कल्याण का यही एकमेव सूत्र है

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

रोचक
आपकी चिठ्ठी चर्चा समयचक्र में

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!