Thursday, July 9, 2009

अक्स

साथी सुख में बन जाते सब दुख में कौन ठहरता है
मेरे आँगन का बादल भी जाने कहाँ विचरता है

कैसे हो पहचान जगत में असली नकली चेहरे की
अगर पसीने की रोटी हो चेहरा खूब निखरता है

फर्क नहीं पड़ता शासन को जब किसान भूखे मरते
शेयर के बढ़ने घटने से सत्ता-खेल बिगड़ता है

इस हद से उस हद की बातें करता जो आसानी से
और मुसीबत के आने से पहले वही मुकरता है

बड़ी खबर बन जाती चटपट बड़े लोग की खाँसी भी
बेबस के मरने पर चुप्पी, कैसी यहाँ मुखरता है

अनजाने लोगों में अक्सर कुछ अपने मिल जाते हैं
खून के रिश्तों के चक्कर में जीवन कहाँ सँवरता है

करते हैं श्रृंगार ईश का समय से पहले तोड़ सुमन
जो बदबू फैलाये सड़कर मुझको बहुत अखरता है

29 comments:

मीत said...

बहुत सुन्दर

AlbelaKhatri.com said...

kya baat hai ..

कैसे हो पहचान जगत में असली नकली चेहरे की।
अगर पसीने की रोटी हो चेहरा खूब निखरता है।।

________bahut khoob !

ताऊ रामपुरिया said...

लाजवाब. शुभकामनाएं.

रामराम.

M VERMA said...

करते हैं श्रृंगार प्रभु का समय से पहले तोड़ सुमन।
सड़कर बदबू फैलाये जो मुझको बहुत अखरता है।।
bahut khoob.

विनोद कुमार पांडेय said...

bahut sundar,

teekha prahar sarkaar aur prashasan par..kisanon ki vyatha uthakar..

badhayi..

sada said...

अनजाने लोगों में अक्सर कुछ अपने मिल जाते हैं।
खून के रिश्तों के चक्कर में जीवन कहाँ सँवरता है।।

बहुत ही सही कहा आपने, बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार्

रश्मि प्रभा... said...

एक बहुत ही अच्छी रचना....

महामंत्री - तस्लीम said...

अरे वाह, जीवन के गहन अनुभवों को आपने गजल में बखूबी उतार दिया है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

vandana said...

bahut hi khoobsoorat aks dikha diya hai aapne jeevan ka.

mehek said...

sunder rachana,ek teekha vaar hi kiya hai,bahut badhiya.

रंजना said...

बड़ी खबर बन जाती चटपट बड़े लोग की खाँसी भी।
बेबस के मरने पर चुप्पी, कैसी यहाँ मुखरता है।।

अनजाने लोगों में अक्सर कुछ अपने मिल जाते हैं।
खून के रिश्तों के चक्कर में जीवन कहाँ सँवरता है।।

क्या बात कही आपने.......एकदम मुग्ध कर लिया.....वाह !!!

आपकी लेखनी को नमन....

Dhiraj Shah said...

ये दुनिया की रीत, सुख सब साथी और दुख मे न कोइ

साथी सुख में बन जाते सब दुख में कौन ठहरता है।
मेरे आँगन का बादल भी जाने कहाँ विचरता है......

खुबसुरत कविता

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इस हद से उस हद की बातें करते जो आसानी से।
और मुसीबत के आते ही पहले वही मुकरता है.
बहुत सुन्दर..........

Suman said...

good

ओम आर्य said...

करते हैं श्रृंगार प्रभु का समय से पहले तोड़ सुमन।
जो बदबू फैलाये सड़कर मुझको बहुत अखरता है।।

बहुत ही सुन्दर ...........

श्यामल सुमन said...

देता हूँ आभार सभी को फिर भी मन में टीस बची।
मिला समर्थन प्यार हमेशा मुझको वही जकड़ता है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

kabad khana said...

suman ji aati uttan rachana

तीसरी आंख said...

अनजाने लोगों में अक्सर कुछ अपने मिल जाते हैं।
खून के रिश्तों के चक्कर में जीवन कहाँ सँवरता है।।


बढ़िया सुन्दर रचना

Priya said...

again good one!

anil said...

बड़ी ही सुन्दर रचना लाजवाब .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बड़ी खबर बन जाती चटपट नेताओं की खाँसी भी।
बेबस के मरने पर चुप्पी, कैसी यहाँ मुखरता है।।
सुन्दर रचना।

मुकेश कुमार तिवारी said...

श्यामल जी,

एक से बढ़कर एक शेर कहें है गज़ल में, वाह!!!
रचना की अहम पंक्तियाँ जो दिल को छू जाती हैं :-

मेरे आँगन का बादल भी जाने कहाँ विचरता है।।

अगर पसीने की रोटी हो चेहरा खूब निखरता है।।

खून के रिश्तों के चक्कर में जीवन कहाँ सँवरता है।।


सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Sudhir (सुधीर) said...

अनजाने लोगों में अक्सर कुछ अपने मिल जाते हैं।
खून के रिश्तों के चक्कर में जीवन कहाँ सँवरता है।।


अत्यन्त सवेदनशील अभिव्यक्ति...एक तीखापन जो हर शेर पर एक सुदृढ़ चोट करता हैं....साधू ।

शारदा अरोरा said...

अगर पसीने की रोटी हो चेहरा खूब निखरता है।।
bahut khoob

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया लिखा है !!

mukesh said...

बड़ी खबर बन जाती चटपट बड़े लोग की खाँसी भी।
बेबस के मरने पर चुप्पी, कैसी यहाँ मुखरता है।।

बहुत ही गहरे की बात कही है.
www.bebkoof.blogspot.com

Prem said...

kal aapki sab rachnaye pad daali achcha likhte hai bhasha ki saadgi men dam hai shubhkamnayen --prem

'अदा' said...

अनजाने लोगों में अक्सर कुछ अपने मिल जाते हैं।
खून के रिश्तों के चक्कर में जीवन कहाँ सँवरता है।।

bahut badhiya...
aur ekdam katu satya hai...

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

फर्क नहीं पड़ता शासन को जब किसान भूखे मरते।
शेयर के बढ़ने घटने से सत्ता-खेल बिगड़ता है।।
इन आगो से आग लेकर मैं आग जलाना चाहता हूँ ,,,
और नहीं कुछ कर सकता भारत का दुर्भाग्य जलाना चाहता हूँ
मेरा प्रणाम स्वीकार करे
सादर प्रवीण पथिक
9971969084

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