Thursday, August 20, 2009

कसक

मंजिल निश्चित पथ अनजान,चतुराई का क्या अभिमान?
जीवन मौत संग चलते हैं,आगत का किसको है भान?
व्याप्त अंधेरा कम करने को, क्षीण ज्योति भी ले आता।
रवि शशि तारे बात दूर की, जुगनू भी मैं बन पाता।।

कोई दूर न सभी पास है,कौन आम और कौन खास है?
अपने पराये का अन्तर पर,सबसे सबको लगी आस है।
इस उलझन की चिर सुलझन का, कोई राह दिखा जाता।
रवि शशि तारे बात दूर की, जुगनू भी मैं बन पाता।।

अधिक है आशा शेष निराशा,भौतिक सुख की दृढ़ जिज्ञासा।
तीन भाग से अधिक है पानी,फिर भी क्यों आधा जग प्यासा?
मृगतृष्णा की भाग दौड़ से, किसी तरह सब बच जाता।
रवि शशि तारे बात दूर की, जुगनू भी मैं बन पाता।।

ज्ञान यहाँ विज्ञान यहाँ है,अच्छाई भी जहाँ तहाँ है।
धर्म न्याय की बातें होतीं,फिर भी सबको त्राण कहाँ है?
क्या रहस्य है इसके पीछे, कोई मुझको सिखलाता।
रवि शशि तारे बात दूर की, जुगनू भी मैं बन पाता।।

सब मिल सकता जिसकी चाहत,हो कोई क्यों हमसे आहत?
भीड़ तीर्थ में यज्ञ भक्ति में,है मानवता क्यों मर्माहत?
काँटे सुमन संग पलते क्यों, कोई भेद बता जाता।
रवि शशि तारे बात दूर की, जुगनू भी मैं बन पाता।।

26 comments:

AlbelaKhatri.com said...

waah shyaamal sumanji,

pahli chaar panktiyon me hi aapne abhibhoot kar diya

geet ka shreeganesh hi aapne shikhar se kiya hai

badhaai
bahut bahut badhaai is udbodhan-geet k liye......

Anil Pusadkar said...

हम भी आपके संग है मगर सुमन जी कांटे नही है।

Dinesh Dadhichi said...

sundar rachna ke liye badhai. gaagar men saagar bharne vali abhivyakti hai.

Babli said...

बहुत ख़ूबसूरत रचना! रचना की हर एक लाइन इतना सुंदर है की कहने के लिए अल्फाज़ कम पर गए! मुझे बेहद पसंद आया ! आपकी लेखनी को मेरा सलाम!
मेरे नए ब्लॉग पर आपका स्वागत है -
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

पी.सी.गोदियाल said...

अच्छी कविता, अच्चे सवालों के साथ !!

vandana said...

waah.........har line apna hi arth liye hai..........padhkar aisa laga jaise pushp ki abhilasha ek baar phir padh rahi hun......lajawaab

रश्मि प्रभा... said...

ज्ञान यहाँ विज्ञान यहाँ है।
अच्छाई भी जहाँ तहाँ है।
धर्म न्याय की बातें होतीं,
फिर भी सबको त्राण कहाँ है?......bahut sahi

ओम आर्य said...

बहुत ही सुन्दर भाव और विचार के धनी हो ......बहुत बहुत बधाई

विनय ‘नज़र’ said...

सच को सींचती रचना
---
मानव मस्तिष्क पढ़ना संभव

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत सुन्दर रचना.

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ख़ूबसूरत रचना

रंजना said...

जाने कितनी बार पढ़ा पर फिर भी मन यह नहीं भरा ...

क्या लिखा है आपने,बस क्या कहूँ.....अद्भुत,अद्वितीय,अप्रतिम.....मन मुग्ध कर लिया आपकी इस रचना ने.....भाव,शब्द चयन,अभिव्यक्ति, लयात्मकता ,सब बेजोड़ है.....वाह ! वाह ! वाह ! सच कहूँ तो इधर हाल में आपने जितनी भी रचनाएँ प्रकाशित की हैं,यह उन सब में से श्रेष्ठ है...

मुलाकात होने पर इसे आपके स्वर में सुनूंगी...

Nirmla Kapila said...

सारी रचना ही बहुत सुन्दर है
ज्ञान यहाँ विज्ञान यहाँ है।
अच्छाई भी जहाँ तहाँ है।
धर्म न्याय की बातें होतीं,
फिर भी सबको त्राण कहाँ है
लाजवाब बधाई

श्यामल सुमन said...

ब्लाग जगत का स्नेह समर्थन है लेखन आधार।
हुआ सुमन अभिभूत हृदय से प्रेषित है आभार।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Dhiraj Shah said...

khubsurat kasak hai dil ki |
dhanyavad

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

आपकी कविता और शब्दों का चुनाव, दोनों ही ग़ज़ब का है | आप हाल की अपनी कविताओं को पुस्तक का रूप क्यों नहीं देते ?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर भाव,
सुन्दर कविता,
बेहतरीन।

अर्चना तिवारी said...

बहुत खूबसूरत रचना...

Kusum Thakur said...

"ज्ञान यहाँ विज्ञान यहाँ है।
अच्छाई भी जहाँ तहाँ है।
धर्म न्याय की बातें होतीं,
फिर भी सबको त्राण कहाँ है?"

वाह क्या खूब पंक्तियाँ लिखी है आपने।
सुमन, जी आपको बहुत बहुत बधाई और आभार।

Pankaj Mishra said...

स्यामल सुमन जी आप से सारी बातें तो हो चुकी है अब यह क्या कमेन्ट दू ?

mail id -
pankajrago@gmail.com

वाणी गीत said...

तीन भाग से अधिक है पानी फिर भी जग इतना प्यासा ...पानी के माध्यम से मानव की भौतिक तृष्णा पर भी क्या खूब प्रहार किया है ..बहुत बढ़िया ..!!

'अदा' said...

ज्ञान यहाँ विज्ञान यहाँ है।
अच्छाई भी जहाँ तहाँ है।
धर्म न्याय की बातें होतीं,
फिर भी सबको त्राण कहाँ है
bahut hi saarthak kavita...
bhav paksh bahut hi sundar bana hai bhaiya..

रंजीत said...

sheetal kar de sabko, sundar kavita ya kavita hee kavita...

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही बेहतरीन रचना. आभार.

Mrs. Asha Joglekar said...

BAHUT SUNDER.

संजय भास्कर said...

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन




SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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