Tuesday, May 11, 2010

नित नित

पूरे होते उसके सपने लगन हो जिसमें खास
कहीं अधूरे हों सपने तो जीवन लगे उदास
हों पूरे या रहे अधूरे मरे कभी ना सपना,
जीवन में नित नित बढ़ते हैं सपनों से विश्वास

आम-आदमी के जीवन से हुआ आम अब दूर
दाम बढ़े हैं आम के ऐसे आम-लोग मजबूर
सरकारें तो आम-लोग की शासक होते खास,
आम-लोग मुरझाये नित नित यह शासन दस्तूर

चाह सुमन की कभी न काँटे लगे सुमन के दामन
सुमन सोचता ऐसा हो तो जीवन लगे सुहावन
मगर नियति ने सुमन को पलना काँटों बीच सिखाया,
सु-मन सुमन का नित नित हो तो खुशियाँ आये आँगन

28 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया रचना ...धन्यवाद

पी.सी.गोदियाल said...

चाह सुमन की कभी न काँटे लगे सुमन के दामन।
सुमन सोचता ऐसा हो तो जीवन लगे सुहावन।
मगर नियति ने सुमन को पलना काँटों बीच सिखाया,
सु-मन सुमन का नित नित हो तो खुशियाँ आये आँगन।।

Bahut khoon suman ji kaayaa kahne dil ko chhoon gai !

दिलीप said...

bahut sundar...

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

अति सुन्दर रचना !

M VERMA said...

आम-आदमी के जीवन से हुआ आम अब दूर।
दाम बढ़े हैं आम के ऐसे आम-लोग मजबूर।
आम आदमी के हिस्से आम कहाँ?
बहुत सुन्दर

दीपक 'मशाल' said...

बहुत ही प्रेरणाप्रद कविता सर.. आजकल ऐसी कवितायें अन्य कवियों की कलम से कम ही निकलती दिखती हैं..

पी.सी.गोदियाल said...

Sorry,khoon ko khoob padhiygaa,

अमिताभ मीत said...

बढ़िया है भाई ...

प्रवीण पाण्डेय said...

छोटी, सुन्दर और सुगढ़ ।

मनोज कुमार said...

हों पूरे या रहे अधूरे मरे कभी ना सपना,
जीवन में नित नित बढ़ते हैं सपनों से विश्वास।।
बहुत सरस और सुंदर रचना।
विश्वास वह पक्षी है जो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है

विनोद कुमार पांडेय said...

आम-आदमी के जीवन से हुआ आम अब दूर।
दाम बढ़े हैं आम के ऐसे आम-लोग मजबूर।
सरकारें तो आम-लोग की शासक होते खास,
आम-लोग मुझाये नित नित यह शासन दस्तूर।।

प्रभावशाली रचना....बढ़िया लगी..बधाई

चन्द्र कुमार सोनी said...

बहुत बढ़िया लिखा हैं आपने.
छोटी कविता में भी बड़ी बात कह जाते हैं आप.
यही आपकी खासियत भी हैं.
धन्यवाद.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना जी
धन्यवाद

शिवम् मिश्रा said...

बेहद उम्दा रचना !! बधाइयाँ !!

राजेन्द्र मीणा said...

चाह सुमन की कभी न काँटे लगे सुमन के दामन।
सुमन सोचता ऐसा हो तो जीवन लगे सुहावन।
मगर नियति ने सुमन को पलना काँटों बीच सिखाया,
सु-मन सुमन का नित नित हो तो खुशियाँ आये आँगन।।

मन के अन्दर ..घुस गयी ये पंक्तिया .....निकल ही नहीं रही ..???

Udan Tashtari said...

वाह श्यामल जी..उम्दा!

गुड्डोदादी said...

पूरे होते उसके सपने लगन हो जिससे खास
कहीं अधूरे हो सपने तो जीवन लगे उदास
सपने पूरे ,
समुन्द्री हिल्लोरें है
बहुत ही लगन से लिखी है

गुड्डोदादी said...

हो पूरे या रहें अधूरे मरे कभी न सपना
जीवन में नित नित बढ़ते है सपनो से विशवास
चाह सुमन की कभी न काँटे लगे सुमन के दामन
सुमन सोचता ऐसा हो तो जीवन लगे सुहावन
सपनो की आस से एक घंटी के बजते ही सांस आनी शुरू होती है

रश्मि प्रभा... said...

आम-आदमी के जीवन से हुआ आम अब दूर।
दाम बढ़े हैं आम के ऐसे आम-लोग मजबूर।
waah

Udan Tashtari said...

एक अपील:

विवादकर्ता की कुछ मजबूरियाँ रही होंगी अतः उन्हें क्षमा करते हुए विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए आभार!

ढपो्रशंख said...

ज्ञानदत्त पांडे ने लडावो और राज करो के तहत कल बहुत ही घिनौनी हरकत की है. आप इस घिनौनी और ओछी हरकत का पुरजोर विरोध करें. हमारी पोस्ट "ज्ञानदत्त पांडे की घिनौनी और ओछी हरकत भाग - 2" पर आपके सहयोग की अपेक्षा है.

कृपया आशीर्वाद प्रदान कर मातृभाषा हिंदी के दुश्मनों को बेनकाब करने में सहयोग करें. एक तीन लाईन के वाक्य मे तीन अंगरेजी के शब्द जबरन घुसडने वाले हिंदी द्रोही है. इस विषय पर बिगुल पर "ज्ञानदत्त और संजयदत्त" का यह आलेख अवश्य पढें.

-ढपोरशंख

रंजना said...

चाह सुमन की कभी न काँटे लगे सुमन के दामन।
सुमन सोचता ऐसा हो तो जीवन लगे सुहावन।


सचमुच ऐसा हो तो फिर बात ही क्या....

सुन्दर रचना....वाह...

अनामिका की सदाये...... said...

mere khayaal se ye YAMAK ALAKAAR ka prayog hai. jo bahut bahut acchha laga.

Babli said...

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रूप से प्रस्तुत किया है! लाजवाब रचना !

hempandey said...

'पूरे होते उसके सपने लगन हो जिसमे खास।'

- और यह लग्न कम लोगों में होती है.

स्वाति said...

हों पूरे या रहे अधूरे मरे कभी ना सपना,
जीवन में नित नित बढ़ते हैं सपनों से विश्वास।।

शानदार रचना..

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