Tuesday, February 15, 2011

संकेत (स-कार माला)

सच्चे सच का सच स्वरूप ही,
सहज-भाव से है स्वीकार।
सत-संकल्प साधना के संग,
सृजन सजाता है संसार।।

सघन समस्या है सागर-सम,
संशय समुचित समाधान में।
सकल सोच का सार है साथी,
संशोधन हो संविधान में।।

सोना से क्या सोना सम्भव,
सापेक्षी संबंध सनातन।
सही सहायक सोच स्वयं का,
साध्य सुलभ, स्वाधीन है साधन।।

सत्कर्मों में सभी समाहित,
समृद्धि, संस्कृति, सदाचार।
सज्जनता, सौन्दर्य, सरलता,
सरसिज, सुरभित-संस्कार।।

सामूहिक समता में संचित,
सबसे सबका सुसंबंध।
सामाजिक सद्भाव सुसज्जित,
सरसे समरस सदा सुगंध।।

सहमत सुमन सलोने सपने,
सार्थक सेवा से साकार।
संवेदन, सहयोग, समर्पण,
सजल सबल हो सूत्रधार।।

8 comments:

गुड्डोदादी said...

श्यामल जी
चिरंजीव भवः

सत्कर्मों में सभी समाहित,
समृद्ध संस्कृति सदाचार।
सज्जनता सौन्दर्य सरलता,
सरसिज सुरभित संस्कार।।

एक अद्धभुत विचारों की सोच का सच

दीप्ति शर्मा said...

adbhut likha hai aapne
bahut sunder

सतीश सक्सेना said...

सच्चे सच का सच स्वरूप ही,
सहजभाव से है स्वीकार।
सत-संकल्प साधना के संग,
सृजन सजाता है संसार।।

सच है ....
सुन्दर सरस एवं सरल रचना के लिए शुभकामनायें !

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना जी धन्यवाद

रंजना said...

भाईजी,

मेरा शब्द कोष यदि आपके शब्द कोष का सतांश bhi समृद्ध hota तो प्रशंसा में स से hee सब कह जाती...

और कुछ तो नहीं मेरे पास,बस प्रणाम स्वीकारें...

माँ शारदा आपकी लेखनी ko ऐसे ही समृद्ध रखें..

प्रवीण पाण्डेय said...

सच में, अद्भुत प्रतिभा प्रदर्शन।

वाणी गीत said...

सकार में ही समष्टि का सम्पूर्ण सौन्दर्य है !

राधिका said...

सहमत सुमन सलोने सपने,
सार्थक सेवा से साकार।
संवेदन सहयोग समर्पण,
सजल सबल हो सूत्रधार।।


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