Friday, February 11, 2011

मेरा जीवन तो शबनम है

आँखों में सूरत हरदम है
तेरे भीतर कितना गम है

देखा दुख जब घर के बाहर
आँख हुई क्यों तेरी नम है

तौल ज़रा औरों के गम से
तेरा गम कितनों से कम है

जितना तेज चमकता सूरज
दुनिया में उतना ही तम है

चाहत मुझको नहीं मलय की
मेरा जीवन तो शबनम है

कब मिल कर के चोट करोगे?
जब कि लोहा अभी गरम है

सुमन भले बदलो, मत तोड़ो
निर्णायक बल में संयम है

12 comments:

राधिका said...

सूरत पे आँखें हरदम है
तेरे भीतर कितना गम है

निकलो घर से, बाहर देखो
प्रायः सबकी आँखें नम है

क्या लिक्खूँ
घर से निकले थे खुशी की तलाश में
गम राह में खड़े थे वही साथ हो लिए

दीप्ति शर्मा said...

bahut sunder
aabhar
...

: केवल राम : said...

जितना तेज चमकता सूरज
दुनिया में उतना ही तम है


आपका कहना सही है ..दुनिया में इतना अंधकार है जिसका कोई अंदाजा नहीं लगा सकता ...और यह भीतरी अंधकार व्यक्ति को हमेशा भ्रमित करता रहता है ...बहुत सार्थक भाव ...आपका आभार

प्रवीण पाण्डेय said...

चाहत मुझको नहीं मलय की
मेरा जीवन तो शबनम है

आपकी अभिव्यक्ति में वही शबनमी कोमलता और शीतलता है।

संजय भास्कर said...

कोमल भावों से सजी ..
वसन्त की आप को हार्दिक शुभकामनायें !
कई दिनों से बाहर होने की वजह से ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

रंजना said...

ओह....क्या बात कही है...

लाजवाब...लाजवाब ...लाजवाब....

अद्वितीय रचना...सदैव की भांति ...

राधिका said...

तौल ज़रा औरों के गम से
तेरा गम कितनों से कम है

वाह क्या खूब सुंदर शब्दों में

भीगी आँखों में मुस्कराते ही है
गम छुपा कर अश्क पीते हम हैं

गुड्डोदादी said...

श्यामल जी
चिरंजीव भाव

जितना तेज चमकता सूरज
दुनिया में उतना ही तम है

बहुत सुंदर क्या लिक्खूँ
लिखने की कलम चलती रहे
धन्यवाद के साथ
आपकी गुड्डो दादी चिकागो से

kshama said...

चाहत मुझको नहीं मलय की
मेरा जीवन तो शबनम है
Bahut hee sundar!

राधिका said...

वेलाटाइन के अवसर पर बहुत सुंदर कविता
प्यार की गहराईयाँ में बंधी प्रेमी के मिलन की प्रतीक्षा

भोर कभी न होती रे
प्रीत की बदली होती रे

RN Prasad said...

क्या बात है

Raghunath Prasad रघुनाथ प्रसाद said...

क्या बात है

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