Friday, May 27, 2011

मुश्किल प्रेम को जीना

मुकद्दर रूठता, रूठे, उसे फिर से संवारूँगा
सुना दो हाले दिल तुम तो, तेरा आँगन बुहारूँगा
खुशी गर आए चेहरे पर, तुम्हारी मैं करूँ पूजा,
सुमन हो भीड़ लाखों की, सदा सूरत निहारूँगा

जो सहते हैं वही रहते, सदा प्रेमी की बाँहों में
जुदाई हो किसी कारण, सदा बसते निगाहों में
मिलन का उत्स दोनों में, तभी मिलना उसे कहते
नहीं तो बेबसी में जिन्दगी, कटती है आहों में

सुमन संज्ञान में रहकर, है मुश्किल प्रेम को जीना
बिना दीवानगी के क्या, मुहब्बत को भला जीना?
मुहब्बत तो सदा अमृत, बना रहता है जीवन में
जुदाई है जहर फिर भी, उसे हँस हँस के है पीना

निगाहें फेर लूँ तुमसे, नहीं फितरत कभी मेरी
किसी का दिल भला तोड़ूँ, कभी आदत नहीं मेरी
कयामत आ भी जाये तो, वफा को मैं निभाऊँगा
वफा तेरी मिले दिल से, सदा चाहत यही मेरी

6 comments:

ana said...

सुमन संज्ञान में रहकर है मुश्किल प्रेम को जीना
बिना दीवानगी के क्या मुहब्बत को भला जीना?

सत्य वचन .....सुन्दर प्रस्तुति

Kajal Kumar said...

वाह सुमन जी सुंदर.

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी सुन्दर कविता।

राज भाटिय़ा said...

वाह वाह जी क्या बात हे... बहुत सुंदर गजल

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह! वाह!

रंजना said...

प्रेम की पाकीजगी और इसके शर्तों को बखूबी बताया आपने इस मनमोहक रचना में..

बहुत बहुत सुन्दर रचना...

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