Sunday, June 12, 2011

सुमन कभी अंगारे रिश्ते

जो आँखों के तारे रिश्ते
टूट रहे हैं सारे रिश्ते

परिभाषाएँ बदल रहीं हैं
शब्दों के चौबारे रिश्ते

आसपास देखो तो कितने
ढोते हैं बेचारे रिश्ते

कौन मोल उनको देता जो
यहाँ वक्त के मारे रिश्ते

बहुत अनोखी बात आजकल
बनते जहाँ सहारे रिश्ते

खून के रिश्ते, ख़ूनी रिश्ते
क्यों बन जाते प्यारे रिश्ते

रिसते रिसते बन जाते हैं
सुमन कभी अंगारे रिश्ते

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

इतना रिसना,
व्यर्थ सिसकना,
किसे दोष दूँ,
समझे वो ना।

गीता पंडित said...

बहुत सुंदर गज़ल श्यामल जी....
हर शेर अच्छा लगा...

बधाई...

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

उम्दा शेर और बेहतरीन गजल

SAJAN.AAWARA said...

bahut achi gajal likhi hai apne. . Jai hind jai bharat

Manpreet Kaur said...

बहुत अच्छी रचना है !मेरे ब्लॉग पर अपना सहयोग दे !
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Voice of youths said...

यथार्थ का चित्रण किया है आपने, बहुत सुन्दर

Maheshwari kaneri said...

श्यामल जी आप मेरी ग्यारह्वीब्लांग मे आकर मेरा उत्साह बढ़ाया..धन्यवाद..आप की गजल पढ़ीबहुत सुंदर..हर शे बहुत अच्छा लगा...

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

परिभाषाएँ बदल रहीं हैं
शब्दों के चौबारे रिश्ते

Khoob Kaha...Behtreen sach ki bangi panktiyan...

Rajesh Kumari said...

बहुत उम्दा खूबसूरत ग़ज़ल मीटर पर भी खरी बहुत खूब

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