जब से मैंने चलना सीखा
हाथ कभी न मलना सीखा
खुद का निर्णय गलत हुआ तो
उसको तुरत बदलना सीखा
जीवन के पथरीले पथ पर
गिर के सदा सम्भलना सीखा
खा कर धोखे कई बार भी
नहीं किसी को छलना सीखा
कोई खुश गर मेरे काम से
सचमुच तभी मचलना सीखा
कई लोग जीते काहिल-सा
खैरातों में पलना सीखा
सफल सुमन उपकारी जीवन
तभी पेड़ ने फलना सीखा
Thursday, June 23, 2011
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रचना में विस्तार
साहित्यिक बाजार में, अलग अलग हैं संत। जिनको आता कुछ नहीं, बनते अभी महंत।। साहित्यिक मैदान म...
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अन्ध-भक्ति है रोग
छुआछूत से कब हुआ, देश अपन ये मुक्त? जाति - भेद पहले बहुत, अब VIP युक्त।। धर्म सदा कर्तव्य ह...
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गन्दा फिर तालाब
क्या लेखन व्यापार है, भला रहे क्यों चीख? रोग छपासी इस कदर, गिरकर माँगे भीख।। झट से झु...
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मगर बेचना मत खुद्दारी
यूँ तो सबको है दुश्वारी एक तरफ मगर बेचना मत खुद्दारी एक तरफ जाति - धरम में बाँट रहे जो लोगों को वो करते सचमुच गद्दारी एक तरफ अक्सर लो...
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लेकिन बात कहाँ कम करते
मैं - मैं पहले अब हम करते लेकिन बात कहाँ कम करते गंगा - गंगा पहले अब तो गंगा, यमुना, जमजम करते विफल परीक्षा या दुर्घटना किसने देखा वो...
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विश्व की महान कलाकृतियाँ-
17 comments:
"खा कर धोखे कई बार भी
नहीं किसी को छलना सीखा"
यदि मनुष्य यह सीख ले, तो दूसरे से ज्यादा खुद को संतुष्टि मिलेगी.
"जीवन के पथरीले पथ पर
गिर के सदा सम्भलना सीखा
खा कर धोखे कई बार भी
नहीं किसी को छलना सीखा"
शायद ज़िंदगी यही है...!!
खुद को समझने और पहचानने के लिए जिन्दगी हमें ये अवसर देती रहती है..
इंसान की हिम्मत और सहनशक्ति की परिक्षा ऐसे ही समय पर होती है !
बस लाजवाब....!!
साँचे लेकर लोग खड़े,
पर अपने से ढलना सीखा।
bahut sundar....
जीवन के पथरीले पथ पर
गिर के सदा सम्भलना सीखा
खा कर धोखे कई बार भी
नहीं किसी को छलना सीखा
बहुत खूबसूरत गज़ल
waah.........jai ho !
आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
BAHUT HI KHUBSURATI SE LIKHA HAI APNE. . . .
JAI HIND JAI BHARAT
सच्चाई को आपने बड़े खूबसूरती से प्रस्तुत किया है! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! उम्दा ग़ज़ल!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
bahut kuchh kaha aapki kavita
सफल सुमन उपकारी जीवन
तभी पेड़ ने फलना सीखा ...
सत्य कहा...जीवन तो तभी सफल हो जब किसीके हित आये यह...
और जो बनना हो तो बादल सूरज चंदा वर्षा सा बना जाय न,जो किसको कुछ भी देते समय भेद नहीं करता और न यह देखता है कि सामने वाला उसे क्या दे रहा है या नहीं...
प्रेरणामयी इस सुन्दर रचना के लिए आभार भाई जी...
खा कर धोखे कई बार भी
नहीं किसी को छलना सीखा...
मन को संतुष्टि इसीमे मिलती है ...
सुन्दर रचना !
खुद का निर्णय गलत हुआ तो
उसको तुरत बदलना सीखा
सुन्दर प्रेरक स्वर
सच्चाई को आपने बड़े खूबसूरती से प्रस्तुत किया है! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है
खुद का निर्णय गलत हुआ तो
उसको तुरत बदलना सीखा
जीवन के पथरीले पथ पर
गिर के सदा सम्भलना सीखा
सीधे- सरल, छोटे-छोटे शब्दोंतथा ,जीवन की नैसर्गिक अनुभूतियों के साथ प्रवाहमयी कविता ने अंतर्मन को छू लिया.
you have written so well about human value and every one should live with same spirit.
great "GAZAL"
Regards,
Ranjeet Jha
bahut achaa
kabhi hamare blog me aaye yaha se mere blog me aayemere blog se bhi update rahe
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