Saturday, May 5, 2012

श्रद्धा से स्वीकार है गंगा

संस्कृति की आधार है गंगा
आमजनों का प्यार है गंगा

जीवनदायिनी, कष्ट निवारणि
विश्वासों की धार है गंगा

जीते गंगा, मरते गंगा
श्रद्धा से स्वीकार है गंगा

पाप धो रही है युग युग से
पर कुछ का व्यापार है गंगा

हरिद्वार से कोलकत्ता तक
कचरों का निस्तार है गंगा

निर्मल जल की जो धारा थी
अब लगती बीमार है गंगा

भारतवासी की माता अब
सुमन बहुत लाचार है गंगा

19 comments:

Anupama Tripathi said...

गंगा की दशा पर सुंदर भाव ....
सुंदर रचना ...!

प्रवीण पाण्डेय said...

वैभव के देखने वालों को आज की स्थिति देखना कितना दुखदायी होता है..

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाक़ई गंगा बीमार है

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह! माँ गंगा को अर्पित आपकी शब्दांजलि ने मन मोह लिया।..बहुत बधाई।

Rajesh Kumari said...

satya vachan aaj ganga ki yahi haalat kar di hum moodh manushyon ne.bahut achcha sochniye vishay par likhi kavita.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पाप धो रही है युग युग से
पर कुछ का व्यापार है गंगा

हरिद्वार से कोलकत्ता तक
कचरों का निस्तार है गंगा

गंगा की व्यथा को खूब उभारा है ॥सुंदर गजल

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...
This comment has been removed by the author.
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात है!!
आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 07/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

मनोज कुमार said...

हर हर गंगे।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

ganga se hee sar uthta hai..ganga se hee ser jhukata hai...kabhi garb ka hai ahsas..kabhi ek bheesan santras

शिवम् मिश्रा said...

आप रचना पढ़ कर न जाने किस कारण से डा॰ भूपेन हजारिका जी का गया हुआ वो अमर गीत याद आ गया ... "ओ गंगा बहती हो क्यूँ ???"

जय गंगा मईया की ...


इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - लीजिये पेश है एक फटफटिया ब्लॉग बुलेटिन

expression said...

बहुत सुंदर...............
तभी तो रोती है गंगा......

सादर

Reena Maurya said...

सही में गंगा की दशा बहुत ही ख़राब होती जा रही है...
सुन्दर भाव ..
सुंदर रचना ...

गुड्डोदादी said...

श्यामल
सदा सुखी रहो
निर्मल जल की जो धारा थी
अब लगती बीमार है गंगा

बार बार पढ़ी क्या लिखूं
तीर्थस्थान की मौज थी गंगा

दिगम्बर नासवा said...

माँ गंगे की पुकार कों जरूर सुनना चाहिए ... वो आज भी इंसान के उत्थान के लिए पवित्र होना चाहती है ...

Minakshi Pant said...

सुन्दर भावपूर्ण रचना |

रचना दीक्षित said...

इस दुर्दशा से मन व्यथित हो जाता है.

सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति.

Sangeeta said...

Ganga ki dasha ka ek satya shabd chitra hai aapki ye rachna. Man ko bhigo jati hai ye Ganga

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