Wednesday, April 17, 2013

फिर भी छोटा आँगन है

दिखता तो अपनापन है
फिर भी छोटा आँगन है

मुख पर खुशियों का विज्ञापन
पर आँखों में सावन है

खुशियों के पल और शबनम का
कितना त्वरित समापन है

माँगों में सिन्दूर भरे हैं
दिखती क्यों वैरागन है

सुमन चतुर इस युग के रावण
सचमुच राम खेलावन है

9 comments:

Dr. Dhanakar Thakur said...

अनुवाद
तैयो छोट आँगन अछि
अपनामे अपनापन अछि

मुहपर खुशीक विज्ञापन
मुदा नयनमे साओन अछि

खुशीक पल आ शबनमक
कतेक त्वरित समापन अछि

माँगमे सिन्दूर भरल अछि
मुदा देखाईत छथि वैरागिन

‘सुमन’ चतुर एहि युगक रावण
ठीकहि रामखेलावन अछि.

Dr. Dhanakar Thakur said...

अनुवाद
तैयो छोट आँगन अछि
अपनामे अपनापन अछि

मुहपर खुशीक विज्ञापन
मुदा नयनमे साओन अछि

खुशीक पल आ शबनमक
कतेक त्वरित समापन अछि

माँगमे सिन्दूर भरल अछि
मुदा देखाईत छथि वैरागिन

‘सुमन’ चतुर एहि युगक रावण
ठीकहि रामखेलावन अछि.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

अरे वाह! बहुत सुन्दर

shashi purwar said...

bahut sundar rachna suman ji

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत प्यारी, पर कहती ढेर सारी।

सरिता भाटिया said...

सुंदर रचना
तेरे मन में राम [श्री अनूप जलोटा ]

Yashwant Mathur said...

आपने लिखा....हमने पढ़ा
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए कल 21/04/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
धन्यवाद!

S. Anupam said...

उत्कृष्ट रचना और ठाकुर जीक द्वारा उम्दा मैथिली अनुवाद :)

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!