Sunday, June 2, 2013

चीता लगे फकीर सा

शेर पूछता आजकल, दिया कौन यह घाव।
लगता है वन में पुनः, होगा एक चुनाव।।

गलबाँही अब देखिये, साँप नेवले बीच।
गद्दी पाने के लिए, कौन ऊँच औ नीच।।

मंदिर जाता भेड़िया, देख हिरण में जोश।
चीता लगे फकीर सा, फुदक रहा खरगोश।।

पीता है श्रृंगाल अब, देख सुराही नीर।
थाली में खाते अभी, कैसे बगुला खीर।।

हुआ जहाँ मतदान तो, बिगड़ गए हालात।
फिर से निकलेगी सुमन, गिद्धों की बारात।।

10 comments:

yashoda agrawal said...

आपने लिखा....
हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए बुधवार 05/06/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है .
धन्यवाद!

गुड्डोदादी said...


पीता है श्रृंगाल अब, देख सुराही नीर।
थाली में खाये सुमन, कैसे बगुला खीर।।
सुंदर व्यंगात्मक दोहे नेता भी हुए अधीर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चुनाव पर सटीक दोहे .....

प्रवीण पाण्डेय said...

दमदार रचना, वाह, गिद्धों की बारात।

Madan Mohan Saxena said...

अच्छी रचना.बहुत बेहतरीन ग़ज़ल

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ४ /६/१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आप का वहां हार्दिक स्वागत है ।

अरुन शर्मा 'अनन्त' said...

आपकी यह रचना कल मंगलवार (04 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

शिवनाथ कुमार said...

हुआ जहाँ मतदान तो, बिगड़ गए हालात।
फिर से निकलेगी सुमन, गिद्धों की बारात।।

कितना सही चित्रण है आज के नेताओं का
बहुत खूब

दिल की आवाज़ said...

सुन्दर दोहे आदरणीय ...बधाई

Shalini Rastogi said...

बहुत प्रभ्शाली व्यंग्य किया है इन दोहों के माध्यम से आपने .. बधाई !

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विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!