Monday, September 2, 2013

कामिनी के श्रृंगार कभी

जीवन से तो मोह बहुत पर फीका है संसार कभी
लगते हैं कुछ दिन फीके तो आते फिर त्योहार कभी

सूरज आस जगाने आता और चाँदनी मुस्काती
पल कुछ ऐसे भी मिलते जब बढ़ जाता है प्यार कभी

जिसने प्यार किया जीवन से ऊँचाई उनको मिलती
अक्सर जिनको हम ठुकराते बन जाते आधार कभी

जीवन की उलझी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश में
प्यार उपजते हैं दिल में पर होती है तकरार कभी

सुमन देवता के सिर चढ़ते मगर आज कुचले जाते
ये भी सच कि बन जाते वो कामिनी के श्रृंगार कभी 

6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर प्रस्तुति ....!!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (03-09-2013) को "उपासना में वासना" (चर्चा मंचःअंक-1358) पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Shalini Kaushik said...

जीवन से तो मोह बहुत पर फीका है संसार कभी
लगते हैं कुछ दिन फीके तो आ जाते त्योहार कभी
ekdam sahi kaha shymal ji

गुड्डोदादी said...

shyamal
आशीर्वाद
जीवन की उलझी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश में
जीवन से तो मोह बहुत पर फीका है संसार कभी
लिखते रहे,लेखनी की स्याही सूखने ना पाए कभी

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह

प्रवीण पाण्डेय said...

यही कभी कभी के अमृत अंश जीवन को रसमय बनाये रहते हैं।

कालीपद प्रसाद said...

सुमन देवता के सिर चढ़ते मगर आज कुचले जाते
ये भी सच कि बन जाते वो कामिनी के श्रृंगार कभी

समय सबसे वलवान .देता कभी मान तो कभी अपमान
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