Sunday, November 17, 2013

बस धन से पहचान

भले विरासत में मिले, धन-दौलत, सामान।
लेकिन मिहनत से सदा, मिले किसी को ज्ञान।।

परम्परा से सीखकर, करते काम सटीक।
दीप जले हर देहरी, जो है ज्ञान प्रतीक।।

अगरबत्तियाँ जल रहीं, सबको यह सन्देश।
करो सुवासित कर्म से, सहकर सारे क्लेश।।

जीने को धन चाहिए, मगर साथ में ज्ञान।
सदियों तक किसकी हुई, बस धन से पहचान।।

जितने भी त्योहार हैं, करता सुमन विचार।
काल-पात्र अनुसार ये, सिखलाते व्यवहार।।

2 comments:

Rajesh Kumari said...

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार१९/११/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
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