Wednesday, November 27, 2013

सुमन मिटे कब रोग

नाम सुमन तो क्या हुआ, केवल यह पहचान?
अपने भीतर खोज नित, तू कितना इन्सान।।

धर्म-स्थल के सामने, सुन दारुण सी चीख।
सुनते गर मालिक सुमन, नहीं माँगते भीख।।

इन्सानों से अब नहीं, चीजों से है प्यार।
होता अब इन्सान से, चीजों सा व्यवहार।।

देख सुमन क्या हाल है, अब तो आँखें खोल।
कोख सहित ममता बिके, लगते उसपर बोल।।

कैसे धन-अर्जन अधिक, फँसा हुआ संसार।
सुमन किसे परवाह जो, टूट रहा परिवार।।

टूटा गर परिवार तो, सुमन सभी स्वच्छन्द।
ममता, करुणा, प्रेम की, धारा नित नित मन्द।।

जाने अनजाने सही, उलझे प्रायः लोग।
भौतिकता की दौड़ का, सुमन मिटे कब रोग।।

2 comments:

Kuldeep Thakur said...

आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 16/12/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
सूचनार्थ।

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तभी संभव है कि हम अपनी पावन भाषा को विश्व भाषा बना सकेंगे।


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Kaushal Lal said...

धर्म-स्थल के सामने, सुन दारुण सी चीख।
सुनते गर मालिक सुमन, नहीं माँगते भीख।।
बहुत सुन्दर .....कटु सत्य .....

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