Sunday, November 3, 2013

कुछ सरकारी जोंक

जिसने खुद को ही सुमन, दिया देशहित झोंक।
खून उसी का पी रहे, कुछ सरकारी जोंक।।

भौतिक सुख सारे मिले, देख सभी में जोश।
कर्तव्यों के बोध का, है कितनों में होश।।

लोक जागरण जो करे, उसपर हुआ प्रहार।
शोषक को सब दिन सुमन, शीतल मन्द बयार।।

साधन हो तो पर्व है, सुमन नहीं तो रोग।
तरस रहे धन के लिए, धनतेरस दिन लोग।।

धोखा अपनों से मिला, कहना है आसान।
मकड़ा फँसता जाल में, खुद बुनता श्रीमान।।

जीवन में सुख दुख सुमन, या सुगन्ध दुर्गन्ध।
कारण से हर कार्य का, निश्चित है सम्बन्ध।।

सास, ससुर, ससुराल संग, सम्भव सात सकार।
साला, साढ़ू सम सुमन, साली, सरहज सार।।


8 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मेरे ख़्याल से, यह शब्‍द शायद जोक है...

श्यामल सुमन said...

नहीं कजल भाई यह शब्द जोक नहीं जोंक ही है। गन्दे पानी में रहने वाला एक रीढ़-विहीन जीव जो मनुष्य के शरीर से चिपककर त्वचा के अन्दर घुस जाता है और खून पीता है। आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

Shah Nawaz said...

सही कहा...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (05-11-2013) भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर : चर्चामंच 1420 पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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दीपावली के पंचपर्वों की शृंखला में
भइया दूज की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर. शुभकामनाएँ त्योहारों की !!
नई पोस्ट : कुछ भी पास नहीं है
नई पोस्ट : दीप एक : रंग अनेक

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर !

श्यामल सुमन said...

आ० राजीव कुमार झा जी आ० सुशील कुमार जोशी जी - आपके सकारात्मक समर्थन के बहुत मायने हैं मेरे लिए - विनम्र आभार

श्यामल सुमन said...

आ० राजीव कुमार झा जी आ० सुशील कुमार जोशी जी - आपके सकारात्मक समर्थन के बहुत मायने हैं मेरे लिए - विनम्र आभार

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