Monday, November 4, 2013

देख सुमन भी पागल है

सालों साल चले हैं सँग सँग मिला कभी आघात नहीं
बाहर से तो हँसी खुशी पर भीतर वैसी बात नहीं
कुछ कुछ खालीपन सा क्यूँ है आज मिलन की बेला में
आपस के जज्बात समझने के बनते हालात नहीं

बोझ नहीं अपनापन होता सहज भाव स्वीकार करो
महसूसो जिसमें अपनापन खुलकर उससे प्यार करो
खून के रिश्तों से सम्भव कि खुद की दूरी बढ़ जाए
मगर हजारों आस पास हैं, उनको अंगीकार करो

जीवन एक अबूझ पहेली जिसकी अलग रवानी है
अपने ढँग से बयां करे सब, सबकी नयी कहानी है
प्यार लुटाते लोग जहाँ पर अक्सर घाव वहीं मिलता
सच मानो कि उन घावों की दिल पर अभी निशानी है

भटक रहा है मन ऐेसे कि लगता कोई बादल है
मन के दरवाजे पर जग ने लगा दिया इक साँकल है
अपने मन की सुनो ना सुनो दुनिया की सुननी होगी
तड़पोगे तो लोग कहेंगे देख सुमन भी पागल है

6 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

कालीपद प्रसाद said...

बढ़िया मुक्तक !
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !
नई पोस्ट आओ हम दीवाली मनाएं!

mahendra mishra said...

जीवन एक अबूझ पहेली जिसकी अलग रवानी है
अपने ढंग से बयां करे सब सबकी नयी कहानी है
प्यार लुटाता सुमन जहाँ पर अक्सर घाव वहीं देता
सच कहता हूँ उन घावों की दिल पर अभी निशानी है

बढिया रचना.. बधाई

श्यामल सुमन said...

आ० रविकर जी आ० कालीपद प्रसाद जी - आपके सकारात्मक समर्थन के बहुत मायने हैं मेरे लिए - विनम्र आभार

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

श्यामल सुमन said...

आ० सुषमा आहुति जी - आपकी सार्थक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद

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