Monday, January 13, 2014

हाथ सुमन बेलन जहाँ

भला भोर की नींद यूँ, किसको नहीं सुहाय।
मगर सुमन आदेश है, झटपट लाओ चाय।।

पहले तू कुछ काम कर, फिर कविता का जाप।
सुमन बोलती प्यार से, बरतन माँजो आप।।

शादी कर या ना करो, दोनों हाल दुरूह।
हाथ सुमन बेलन जहाँ, वहीं काँपती रूह।।

श्यामल से कहती सुमन, जीना हो गर साथ।
साँझ, सकारे साफ कर, झाड़ू लेकर हाथ।।

आँच लगाओ ठीक से, धीमी कर लो आग।
धो कर काटो तब सुमन, डाल कड़ाही साग।।

काम निबट ले झट सुमन, फिर जाओ बाजार।
भोज सखी घर आज है, करना मुझे सिंगार।।

"सुपर मेन" शादी किया, बना है "जेंटल मेन"
"वाच मेन" कुछ दिन सुमन, अब तो "डोबर मेन"।।

नोट - १ - साग - शाक (कालान्तर और क्षेत्रीयता के हिसाब से परिवर्तित और प्रचलित)
         २ - हिन्दी छन्द में अंग्रेजी शब्द के प्रयोग के लिए मुआफी की अपील के साथ

8 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ!

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ !

कविता रावत said...

"सुपर मेन" शादी किया, बना है "जेंटल मेन"।
"वाच मेन" कुछ दिन सुमन, अब तो "डोबर मेन"।।
..बहुत खूब! बनना ही पड़ता है घर गृहस्थी का तकाजा जो ठहरा ..
मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ ..

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मकर संक्रांति की हार्दिक मंगलकामनाएँ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Amit Srivastava said...

बहुत खूब

कालीपद प्रसाद said...

बहुत सुन्दर दोहे !
मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएं !
नई पोस्ट हम तुम.....,पानी का बूंद !
नई पोस्ट बोलती तस्वीरें !

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर रचना।

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