Wednesday, March 18, 2015

ऐसे भी और वैसे भी

गड्ढे में तो गिरना ही था, ऐसे भी और वैसे भी
शादी मुझको करना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

भाई बहन से किया शरारत बचपन में शैतान बहुत
बीबी से तो डरना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

कई लोग ससुराल में बसते मेरे घर ससुराल बसा
बिना मौत के मरना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

आज़ादी का ख्वाब देखते शादी कर के यार मेरे
कैद तुम्हें तो चुनना ही था, ऐसे भी और वैसे भी

निडर सुमन होकर मंचों पर ऐसी रचना पढ़ जाते
घर में तो चुप रहना ही था, ऐसे भी और वैसे भी 

4 comments:

गुड्डोदादी said...

i am the master king of the house

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (20-03-2015) को "शब्दों की तलवार" (चर्चा - 1923) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vinay Singh said...

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Shiv Raj Sharma said...

क्या बात है बहुत विनोदपूर्ण रचना है

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!