Sunday, April 30, 2017

सोच! सुमन क्या बोल रहा है?

रिश्ते - नाते, अमृत धारा,
निभ जाए वो तबतक प्यारा,
रिश्ते जब रिसने लग जाए,
छा जाता तब तब अंधियारा,
ऐसा लगता वो जीवन में,
जहर गमों के घोल रहा है।
सोच! सुमन क्या बोल रहा है?

समय के सँग रिश्ते गढ़ते हैं,
इक दूजे को नित पढ़ते हैं,
लेकिन कुछ स्वारथ के कारण,
भूल प्रेम को, सर चढ़ते हैं,
आसपास का हाल देख जो,
मन की आँखें खोल रहा है।
सोच! सुमन क्या बोल रहा है?

ये दुनिया, एक अद्भुत मेला,
मिल के जी लो, मिटे झमेला,
देख दर्द उनकी आँखों में,
जीता जो भी निपट अकेला,
वो कह सकता है जीवन में,
क्या रिश्तों का मोल रहा है?
सोच! सुमन क्या बोल रहा है?

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