Saturday, June 2, 2018

मुमकिन है तुरपाई

बादल फटते, दूध भी फटता, मुश्किल है भरपाई।
फटते जब कपड़े या रिश्ते, मुमकिन है तुरपाई।
सीख लो मेरे भाई।
सीख ले तू भी ताई।।

जीवन है अनमोल खजाना, चतुराई से इसे बिताना।
कोई गम को खोज के रोता, गाता कोई सदा तराना।
ठान लिया जो उसे बुढ़ापे में आती तरुणाई।
सीख ले -----

आनेवाले कल की खातिर क्या क्या जोड़ रहे हैं?
इस कारण से पल कोमल जो उसको छोड़ रहे हैं।
छूटा घर आँगन भी अपना, करते रहे कमाई।
सीख ले -----

साँसें जब टूटेगी, टूटे, हमको जीना होगा।
हँसते हँसते जहर गमों का हमको पीना होगा।
यकीं सुमन को बजेगी यारो आँगन में शहनाई।
सीख ले -----

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-06-2018) को "हो जाता मजबूर" (चर्चा अंक-2992) (चर्चा अंक-2985) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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