Wednesday, July 25, 2018

बोली जब बचकानी हो

यादें भले पुरानी हो
नूतन रोज कहानी हो

देवराज कोई होगा
इक परियों की रानी हो

छोटे बच्चों के संग में
दादा, दादी, नानी हो

और बुजुर्गों की खातिर
आँखों में भी पानी हो

लगे दूर जाना अच्छा
बेटी जहाँ सयानी हो

लगता है कितना प्यारा
बोली जब बचकानी हो

गम से लड़ते रहने से
चाल सुमन मस्तानी हो

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-07-2018) को "कौन सुखी परिवार" (चर्चा अंक-3045) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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