Sunday, July 29, 2018

तू पत्थर सी मूरत बन जा

कली कभी तू मत घबराना,
बन के सुमन तुझे है आना,
कोई आंसू देख सके ना, तू पत्थर सी मूरत बन जा।
वक्त से ऐसे लड़ते रहना, कल की एक जरूरत बन जा।।

धरती जैसे इस जीवन में सुख दुख घूम रहा है।
संकट में जो आज उसी को कल सुख चूम रहा है।
जीत समय को तू ऐसे कि सबकी प्यारी सूरत बन जा।।
कल की एक जरूरत बन जा, तू पत्थर सी मूरत बन जा।।

सीता का दुख और द्रोपदी अपनी महक लिए है।
जितना भी तपता है सोना उतनी चमक लिए है।
वैसे जूझ, बसो यादों में, सबके लिए मुहुरत बन जा।।
कल की एक जरूरत बन जा। तू पत्थर सी मूरत बन जा।। 

7 comments:

Unknown said...

जय मां हाटेशवरी...
अनेक रचनाएं पढ़ी...
पर आप की रचना पसंद आयी...
हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 31/08/2018
को
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की गयी है...
इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (31-07-2018) को "सावन आया रे.... मस्ती लाया रे...." (चर्चा अंक-3049) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kusum Kothari said...

तूं पत्थर सी मूर्त बनजा।
बहुत खूब।

Supriya Pandey said...

उम्दा रचना बेहतरीन भाव ढेरों शुभकामनाएं सुमन जी

Meena Sharma said...

अच्छी संदेशप्रद कविता

RADHA TIWARI said...

वाह बहुत खूब

RADHA TIWARI said...

वाह बहुत खूब

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