और भागो।
जहाँ तक जी चाहे।
भागते रहो।
भागो!
जोर जोर से भागो।
कभी घर से,
तो कभी अपनी
वैयक्तिक जिम्मेवारियों से,
भागो! एक भगोड़े की तरह।
भागो!
एक कायर की तरह,
जीवन के हर सवाल से,
भागो! लगातार भागो!
कभी पड़ोसी से,
कभी सभा से,
तो कभी संसद से,
भागो! खूब भागो।
भागो!
आखिर कब तक भागोगे?
कहाँ तक भागोगे?
क्या अपने कर्मों से,
कभी भाग सकोगे?
भागो!
पर याद रखो,
तुलसी बाबा कह गए हैं कि
कर्म प्रधान विश्व रचित राखा।
जो जस करहिं सो तस फल चाखा।।

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