Saturday, June 20, 2009

संदेश

भारत है वीरों की धरती, अगणित हुए नरेश।
मीरा, तुलसी, सूर, कबीरा, योगी और दरवेश।
एक हमारी राष्ट्र की भाषा, एक रहेगा देश।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

सोच की धरती भले अलग हों, राष्ट्र की धारा एक।
जैसे गंगा में मिल नदियाँ, हो जातीं हैं नेक।
रीति-नीति का भेद मिटाना, नूतन हो परिवेश।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

शासन का मन्दिर संसद है, लगता अब लाचार।
कुछ जनहित पर भाषण दे कर, करते हैं व्यापार।
रंगे सियारों को पहचाने, बदला जिसने वेष।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

वीर शहीदों के भारत का, सपने आज उदास।
कर्ज चुकाना है धरती का, मिल सब करें प्रयास।
घर-घर सुमन खिले खुशियों की, कहना नहीं बिशेष।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

22 comments:

M Verma said...

कर्ज चुकाना है धरती का, मिल सब करें प्रयास।
bahut achchha sandesh. sandesh jan-jan tak pahuche yahi kamna hai

राज भाटिय़ा said...

आप ने बहुत ही अच्छॆ ढंग से सच लिखा....
शासन का मन्दिर संसद है, क्यों बिल्कुल लाचार।
ख़ुद का हित करते, पर दिखते, जनहित को तैयार।
रंगे सियारों को चुनना है, बदला जिसने वेष।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।
बहुत सुंदर संदेश है.
धन्यवाद
मुझे शिकायत है
पराया देश
छोटी छोटी बातें
नन्हे मुन्हे

mehek said...

sunder rachana.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भाई, बहुत सुन्दर विचार.

cartoonist anurag said...

bahut hi accha likha hai aapne.....

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

सुमन जी, आपने बहुत अच्छा सन्देश दिया है इस गेय कविता के माध्यम से। साधुवाद।

SWAPN said...

wah suman ji,

ख़ुद का हित करते, पर दिखते, जनहित को तैयार।
रंगे सियारों को चुनना है, बदला जिसने वेष।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

behatareen geet hai , badhai sweekaren.

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बहुत सुन्दर, अत्यंत प्रभावशाली रचना !!!

ओम आर्य said...

bahut hi sundar bhawabhiwyakti jisaka koi jabaab nahi hai ..........rastraprem se labrez baate behisab

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर भाव पूर्ण गीत है।बहुत अच्छा लगा।आभार।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सुन्दर.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बधाई. अत्यंत प्रभावी रचना.

रामराम.

Mumukshh Ki Rachanain said...

शासन का मन्दिर संसद है, क्यों बिल्कुल लाचार।
ख़ुद का हित करते, पर दिखते, जनहित को तैयार।
रंगे सियारों को चुनना है, बदला जिसने वेष।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

सुन्दर, सपाट और तीखी अभिव्यक्ति. सन्देश घर-घर पहुँच कर ही रहेगा. पर शायद इक्कीसवी शताब्दी में यह कार्य काग नहीं बल्कि इंटरनेट कर रहा है

इंटरनेट! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

चन्द्र मोहन गुप्त

डाकिया बाबू said...

बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति....सुन्दर रचना ...बधाई !!
कभी मेरे ब्लॉग पर भी पधारें !!

Ram Shiv Murti Yadav said...

आपकी अद्भुत सृजनशीलता का कायल हूँ....वाकई आपकी रचना तमाम रंग बिखेरती है...साधुवाद.***
"यदुकुल" पर आपका स्वागत है....

‘नज़र’ said...

सुन्दर सृजन

Madhur said...
This comment has been removed by the author.
दर्पण साह "दर्शन" said...

वीर शहीदों के भारत का, सपने आज उदास।
कर्ज चुकाना है धरती का, मिल सब करें प्रयास।
घर-घर सुमन खिले खुशियों की, कहना नहीं बिशेष।
कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।

please...
please...
save india ...
...coz we don't have any option....
you see!

श्यामल सुमन said...

आप सबके स्नेह और समर्थन के प्रति आदर सहित आभार निवेदित है। स्नेह बनाये रखें।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह सुमन जी वाह.... सुंदर कविता..

रंजना said...

sundar geet aur uske bhaav man ko pighla gaye....waah !!!

'अदा' said...

बहुत सुन्दर भाव पूर्ण गीत है...

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!