Wednesday, July 29, 2009

फ़ितरत

डर के जीता है क्यों आज भी आदमी
जबकि दुनिया सजी आदमी के लिए
होश में एक तो कई मदहोश हैं
आदमी क्यों नहीं आदमी के लिए

आदमी आदमी को लगाते गले
आदमी काटते आदमी गले
आदमी आदमी से परेशान क्यों
आदमियत तो है आदमी के लिए

आदमी ने विजय चाँद पर पा लिया
आदमी ने लहू आदमी का पिया
आदमी देवता और शैतान भी
नहीं हैवानियत आदमी के लिए

आदमी न तो ढाँचा वो जज़्बात है
आदमी बन के जीना बड़ी बात है
दूर नफ़रत करें मिल चमन के सुमन
सारी रूमानियत आदमी के लिए

20 comments:

दिगम्बर नासवा said...

VAAH आदमी की FITRAT को कितना KAREEB से लिखा है............ SUNDAR RACHNA SUMAN जी ........

मोहिन्दर कुमार said...

सबसे बडा डर तो आदमी को अपनी शक्सीयत से होता है क्योंकि वही बहुआयामी होती है.. न जाने कब कौन सा आयाम दुनिया के सामने खुल जाये यही सबसे बडा डर है..
सुन्दर रचना पढवाने के लिये आभार

महेन्द्र मिश्र said...

डर के जीता है क्यों आज भी आदमी
जबकि दुनिया सजी आदमी के लिए
एक है होश में कई मदहोश हैं
आदमी क्यों नहीं आदमी के लिए

सुन्दर रचना

M VERMA said...

आदमी की विसंगतियो को बहुत प्रभावशाली ढंग से ---
बहुत खूबसूरत रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

डर के जीता है क्यों आज भी आदमी
जबकि दुनिया सजी आदमी के लिए
एक है होश में, कितने मदहोश हैं
आदमी क्यों नहीं आदमी के लिए

बहुत बधाई!

Mithilesh dubey said...

आदमी ने विजय चाँद पर पा लिया
आदमी ने लहू आदमी का पिया
आदमी देवता और शैतान भी
नहीं हैवानियत आदमी के लिए

बहुत सुन्दर रचना ।

जीवन सफ़र said...

आदमी न तो ढाँचा वो जज़्बात है
आदमी बन के जीना बड़ी बात है
बहुत खूब!

डॉ. मनोज मिश्र said...

आदमी ने विजय चाँद पर पा लिया
आदमी ने लहू आदमी का पिया
आदमी देवता और शैतान भी
नहीं हैवानियत आदमी के लिए

आदमी न तो ढाँचा वो जज़्बात है
आदमी बन के जीना बड़ी बात है
दूर नफ़रत करें मिल चमन के सुमन
सारी रूमानियत आदमी के लिए ...
सुन्दर रचना पढवाने के लिये आभार.

अनिल कान्त : said...

mujhe aapki rachna bahut pasand aayi

श्यामल सुमन said...

आप सबका सतत स्नेह और समर्थन मुझमें नयी उर्जा का संचार करता है। एक पंक्ति

"एक है होश में, कितने मदहोश हैं"
को इस तरह

"होश में एक तो कई मदहोश हैं"

बदलने की मुझे जरूरत महसूस हुई और ऐसा संशोधन कर दिया हूँ।

पुनश्च आप सभी के प्रति आभारी हूँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Babli said...

आदमी की फितरत को आपने बखूबी लिखा है ! बहुत सुंदर रचना! मुझे बेहद पसंद आया!

Dhiraj Shah said...

आदमी की यही फितरत है।

ताऊ रामपुरिया said...

सटीक लिखा आपने.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

सटीक लिखा आपने.

रामराम.

Priya said...

aap bahut achcha likhte hain.....kaise generate hote hai thought?

congrats you!

मुकेश कुमार तिवारी said...

श्यामल जी,

जीवन जीने के अंदाज को सिखाती हुई रचना अच्छी लगी, कितना सुन्दर कहा है:-

आदमी न तो ढाँचा वो जज़्बात है
आदमी बन के जीना बड़ी बात है
दूर नफ़रत करें मिल चमन के सुमन
सारी रूमानियत आदमी के लिए

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

Pankaj Mishra said...

खूबसूरत रचना !
आभार

Pankaj

महामंत्री - तस्लीम said...

Aadmi ki fitrat ko shabdon men utaar diya hai aapne.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Nirmla Kapila said...

आदमी न तो ढाँचा वो जज़्बात है
आदमी बन के जीना बड़ी बात है
दूर नफ़रत करें मिल चमन के सुमन
सारी रूमानियत आदमी के लिए ...
aaअदमी की फितरत का सजीव चित्रण किया है नहुत उमदा रचना है बधाई

युवा said...

आदमी न तो ढाँचा वो जज़्बात है
आदमी बन के जीना बड़ी बात है
दूर नफ़रत करें मिल चमन के सुमन
सारी रूमानियत आदमी के लिए...dad deta hoon apke bhavon ki...lajwab rachna.

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