Thursday, October 8, 2009

दर्शन दूरदर्शन का

आदिकाल से रही है परिवार के लिए बीबी की जरूरी,
लेकिन आजकल हर घर में है टी०वी० की मजबूरी।

टी०वी० के कई चैनल होते हैं,
और उन चैनलों के अलग अलग पैनल भी होते हैं।
एक ओर योग द्वारा रोग-मुक्ति के उपाय सुझाये जाते हैं,
तो दूसरी ओर सिगरेट और शराब के विज्ञापन दिखाये जाते हैं।

बात समझ में आये, यह जरूरी नहीं,
पर अंग्रेजी चैनल देखना अनिवार्य है,
वर्तमान भारत में शान से जीने के लिए,
अंग्रेजियत की छाप भी तो अपरिहार्य है।

दो वक्त की रोटी भी जिसे नहीं मिलती,
उसकी संख्या सत्तर प्रतिशत के लगभग है,
पर अमूल वाले अपने विज्ञापन में समझाते हैं कि,
असली मक्खन के स्वाद पे सभी का हक है।

हजारों पूल और मकान बनते ही गिर जाते हैं,
बेवजह कई लोग मर जाते हैं,
सरकारी पक्ष बिठाते हैं जाँच आयोग,
रिपोर्ट आने पर विपक्षी कहते, गलत है अभियोग,
लेकिन असली कारण से सब अनजान है,
जबकि बिड़ला वाले रोज समझाते हैं कि इस सीमेंट में जान है।

कहीं सिनेमा तो कहीं सिर्फ गाना सुनाया जाता है,
कहीं रिमिक्स के नाम पर,
अत्यन्त छोटा और पारदर्शी कपड़ा पहनाया जाता है।
कई चैनलों में सबेरे सबेरे सुनायी पड़ती है संतों की वाणी,
तो किसी के कैमरे में कैद है,
उन्हीं संतों के काले कारनामे की कहानी।

सेविंग ब्लेड से लेकर ट्रेक्टर के टायर तक,
नारी देह का खुला प्रदर्शन होता है,
"यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते" का प्राचीन सिद्धान्त,
अपने आप पे रोता है।

एक तरफ दिखलाया जाता है महिलाओं का शोषण,
तो दूसरी ओर चलता है महिला-मुक्ति का आन्दोलन,
और महिला-मुक्ति आन्दोलन का समाज पे इतना प्रभाव है,
कि जन्म से पहले ही "मुक्ति" का प्रस्ताव है।

कहीं "आस्था" कहीं "साधना" तो कहीं "संस्कार" है,
कई चैनलों में तो सिर्फ समाचार ही समाचार है,
जिसका कैमरा सिर्फ चंद लोगों के इर्द गिर्द घूमता,
क्योंकि आम जनता से उसे क्या सरोकार है?
अपराधी-ब्रांड नेता की जब होती है जेल-यात्रा,
तो समाचार वाले, लाइव कवरेज करके,
बना देते इसको शोभा-यात्रा।

कुत्ता जब आदमी को काटता है,
तो क्या यह 'समाचार' बन पाता है?
अगर आदमी कुत्ता को काट खाये,
तो तत्काल यह सुर्खियों के समाचार बन जाये।

एक दिन गजब हुआ,
एक पागल कुत्ता ने,
एक महत्वपूर्ण दल के महत्वपूर्ण नेता को काटा,
न्यूज चैनल वालों ने इसे,
तत्काल हाट केक की तरह बाँटा।
एक चैनल नेताजी के घाव तथा
इलाज का लाइव टेलिकास्ट दिखा रहा था,
तो दूसरा उस कुत्ता के नस्ल और
इतिहास का पता लगा रहा था।
सब अपने आप में इतना व्यस्त थे कि
मानो पूरा का पूरा देश ठहर गया,
पर सच मानिये जनाब, एक घंटे बाद,
नेता मुस्कुरा रहा था और कुत्ता मर गया।

25 comments:

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

कविता एक साथ सरल, प्रखर और व्यंग की भूमिका को बखूबी निभा ले गयी है,,,बधाई..

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सरल भाषा में लिखी गयी आपकी कविताओं को पढकर दंग रह जाती हूं .. कमाल का लेखन है आपका !!

विनोद कुमार पांडेय said...

bahut badhiya prsang utahya hai aapne aaj to t.v. par manoranjan ki dasha hi badal chuki hai....

Kusum Thakur said...

बहुत ही सहज भाषा में कही गयी एक एक बात स्पष्ट और सटीक । बधाई !!

वन्दना said...

behtreen vyagya..........aaj ke sach ko ujagar karta.

रश्मि प्रभा... said...

waah,chainlon ka aur dekhnewalon par sahi kataksh

राज भाटिय़ा said...

हजारों पूल और मकान बनते ही गिर जाते हैं,
बेवजह कई लोग मर जाते हैं,
सरकारी पक्ष बिठाते हैं जाँच आयोग,
रिपोर्ट आने पर विपक्षी कहते, गलत है अभियोग,
लेकिन असली कारण से सब अनजान है,
जबकि बिड़ला वाले रोज समझाते हैं कि इस सीमेंट में जान है।
बहुत सुंदर जी , आप ने तो सरल भाषा मै भी सच सच बोल दिया, धन्यवाद

दिगम्बर नासवा said...

सटीक कहा है सुमन जी .......... कमाल का .........

Nirmla Kapila said...

भाशा चाहे सरल है लेकिन भाव बहुत गहरे हैं आभार इस सुन्दर व्यंग के लिये करारी चोट आभार

रंजना said...

क्या कहूँ...लाजवाब ...लाजवाब... लाजवाब.....बहुत बहुत लाजवाब ........

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सब अपने आप में इतना व्यस्त थे कि
मानो पूरा का पूरा देश ठहर गया,
पर सच मानिये जनाब, एक घंटे बाद,
नेता मुस्कुरा रहा था और कुत्ता मर गया।

बहुत सही.

Pankaj Mishra said...

मस्त लिखा श्यामल जी जोरदार लगा ये

M VERMA said...

बहुत खूब लिखा है सुमन जी!
नेता वाला प्रसंग प्रासंगिक है और हमे सचेत भी करती है. कुत्ते पर रिसर्च मैने भी किया था अवसर मिले तो आईए नस्ल का पता चल जायेगा.
http://phool-kante.blogspot.com/2009/08/blog-post.html

Priya said...

Behad, shaandaar, jaandaar bhaavpoorn, vyangpoorn, yathartpark abhivyakti.......Naitikta ka chapter....school syllabus se gauab hai.....Nursery ke bachchey Computer education seekh rahe hai aur hindustaan europe se inspire ho raha hai........Apni rachna Advet. agency ko bhejiye shayad antaratma jaag jaye........

Babli said...

बहुत ही सुंदर और सठिक लिखा है आपने और आपकी लिखी हुई ये शानदार रचना प्रशंग्सनीय है!

योगेश स्वप्न said...

wah shyamal ji, sahi vyangya hai samaaj ke kai paksh samet liye hain ismen, rachna ka ant wah wah wah.

सागर said...

आप कहीं दूरदर्शन और आज के टेलीविज़न चैनलों के बीच कुछ कन्फ्यूज़ हो गए लगते हैं शायद ....बहरहाल कविता ठीक ठाक है - शीर्षक कुछ और होता तो बेहतर था !

श्यामल सुमन said...

आप सबके स्नेह और समर्थन के प्रति विनम्र आभार प्रेषित है।

सादर
श्यामल सुमन
www.manoramsuman.blogspot.com

दर्पण साह "दर्शन" said...

Shyamal ji gurudaas maan ka gana yaad aa gaya...
"TV da mamla hai,
Biwi da mamal hai....
Kuch to karo jatan..."
ye bhi kabhi doordarshan main hi suna tha...
CPC ki prastuti...
Those days !!

दो वक्त की रोटी भी जिसे नहीं मिलती,
उसकी संख्या सत्तर प्रतिशत के लगभग है,
पर अमूल वाले अपने विज्ञापन में समझाते हैं कि,
असली मक्खन के स्वाद पे सभी का हक है।

ye line behteri hai....

kabhi maine bhi likha tha...
"baazaron main chadne waloon, yaad ise bhi rakhna tum,
Aadha bharat aaj bhi shyad aadhi roti khata hai."

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

प्रणाम गुरुवर समाज की अव्यवस्था पर एक तीखा व्यंग करती बेहतरीन रचना
सेविंग ब्लेड से लेकर ट्रेक्टर के टायर तक,
नारी देह का खुला प्रदर्शन होता है,
"यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते" का प्राचीन सिद्धान्त,
अपने आप पे रोता है।
मेरा प्रणाम स्वीकार करे
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

'अदा' said...

aaj pripeksh mein ek saarthak kavita likhi hai bhaiya aapne..
bahut badhiya..

श्याम सखा 'श्याम' said...

अच्छी व्यंग्य रचना पर बधाई।
दीपों सा जगमग जिन्दगी रहे
सुख की बयार चहुं मुखी बहे
श्याम सखा श्याम

अनामिका की सदायें ...... said...

kamal ki prastuti...jabardast vyngy.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दरता से कटाक्ष करती रचना....
सादर बधाई...

Sangeeta said...

Wah
Kitni saralta se aapne sahaj roop me ek sachchai sabke samaksh rakh di
Wah
Is cement me jaan hai - tabhi to wo le leta jaan hai
Asli makhan ke swad par sabhi ka hak hai - hak lena sabko aata hai mujhe isme shak hai

महिला-मुक्ति आन्दोलन का समाज पे इतना प्रभाव है,
कि जन्म से पहले ही "मुक्ति" का प्रस्ताव है। Wah kya baat hai
Aapki rachna ki jitni prashansa ki jaye kam hai

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