Tuesday, December 15, 2009

इश्क चढ़ता गया

उम्र बढ़ती गयी इश्क चढ़ता गया
ख्वाब सजते रहे दिन गुजरता गया

उम्र छोटी बहुत जिस्म से प्यार की
इश्क आँखों से होकर निखरता गया

उलझनों में उलझने की फितरत नहीं
प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया

चाँदनी रात में कुमुदिनी सो गयी
चाँद का जो चमन था उजड़ता गया

बात ईमान की आधुनिकता नहीं
बस यहीं पर सुमन भी पिछड़ता गया

30 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

उम्र बढ़ती गयी इश्क चढ़ता गया
ख्वाब सजते रहे दिन गुजरता गया

बहुत सुन्दर
उम्र गुजरती गई पड़ाव दर पड़ाव आते रहे
उम्र बढ़ती गई अनुभवों के ख्बाव सजते रहे

चंदन कुमार झा said...

बहुत हीं सुन्दर !!!!

मनोज कुमार said...

उलझनों में उलझने की फितरत नहीं
प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया
आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

अजय कुमार झा said...

वाह श्यामल जी वाह,
सभी एक से बढके एक , मजा आ गया ।

AlbelaKhatri.com said...

kyaa baat hai...........


उलझनों में उलझने की फितरत नहीं
प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया

bahut khoob !

kamaal ki kaarigari waali gazal..

sadhana said...

धन्यवाद जी , आप मेरे ब्लॉग पे आये और मेरा हौसला बढाने के लिए ...

आपके ब्लॉग पे आकर बहुत ही अच्छा लगा कई खुबसुरत रचनाये पड़ने को मिली ...बहुत-बहुत धन्यवाद आपका !

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब...

Sadhana Vaid said...

बहुत खूब !

योगेश स्वप्न said...

बात ईमान की आधुनिकता नहीं
बस यहीं पर सुमन भी पिछड़ता गया

suman ji ye to dil ko bha gain.

हिमांशु । Himanshu said...

प्रेम-रत व्यक्तित्व का सहज परिचय -
"उलझनों में उलझने की फितरत नहीं
प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया"

प्रविष्टि का आभार ।

पी.सी.गोदियाल said...

चाँदनी रात में कुमुदिनी सो गयी
चाँद का जो चमन था उजड़ता गया

बात ईमान की आधुनिकता नहीं
बस यहीं पर सुमन भी पिछड़ता गया

Ati sundar suman jee !

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

बात ईमान की आधुनिकता नहीं
बस यहीं पर सुमन भी पिछड़ता गया

बेहतरीन ...

वन्दना said...

उम्र बढ़ती गयी इश्क चढ़ता गया
ख्वाब सजते रहे दिन गुजरता गया
khoobsoorat khyal
बात ईमान की आधुनिकता नहीं
बस यहीं पर सुमन भी पिछड़ता गया

bahut hi sundar baat.
pls visit at-http://vandana-zindagi.blogspot.com

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wahwa..Sunder rachna..

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

का भाई इश्क का निखार केवल आँखों
में ही होता रहेगा ?

मधुकर राजपूत said...

कमाल की रचना है सुमन जी। सुमन की तरह खिलते रहिए।

डॉ टी एस दराल said...

प्यार का असली मज़ा तो उमर चढ़ने के बाद ही आता है।
बहुत सुंदर रचना ।

sada said...

उलझनों में उलझने की फितरत नहीं
प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया ।
बहुत ही सुन्‍दर ।

हर्षिता said...

अच्छी रचना।

श्यामल सुमन said...

टिप्पणियाँ भी मिलीं मैंने जब जब लिखा
है सुमन का नमन प्यार बढ़ता गया

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

Kusum Thakur said...

बस मैं इतना ही कहूँगी वाह सुमन जी !!

नीरज गोस्वामी said...

उम्र छोटी बहुत जिस्म से प्यार की
इश्क आँखों से आकर निखरता गया

सुमन जी इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई...

नीरज

गौतम राजरिशी said...

वाह सुमन जी! एकदम चुस्त बहर पे सधी हुई ग़ज़ल...बेहतरीन शेर!!

खास कर मक्ता तो खूब बुना है आपने सर जी।

mehek said...

उम्र छोटी बहुत जिस्म से प्यार की
इश्क आँखों से आकर निखरता गया

उलझनों में उलझने की फितरत नहीं
प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया
shaandar gazal,aafrin

BrijmohanShrivastava said...

बस यहीं पर सुमन पिछड़ गया -मुनव्बर राणा साहेब का शेर भी है "" हम ईंट-ईंट को दौलत से लाल कर देते, //अगर ज़मीर की चिड़िया हलाल कर देते ।""

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया!!

रंजना said...

Adhik kahne layak kuchh nahi........BAS.... WAAH WAAH WAAH !!!!! LAJAWAAB !!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

wah MATALA me gazab ka atmbodh...

संजय भास्कर said...

वाह श्यामल जी वाह,
सभी एक से बढके एक , मजा आ गया ।

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Archana thakur said...

बहुत सुंदर..

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!