Sunday, January 24, 2010

अभिसार जिन्दगी है

संधर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी है
काँटों का सेज फिर भी स्वीकार जिन्दगी है

मिलता सुकूँ हवा से जो तन पे हो पसीना
भूखे को जैसे रोटी अभिसार जिन्दगी है

इन्सानियत की कीमत, ईमान की भी कीमत
हालात ऐसे लगते व्यापार जिन्दगी है

क्या माँगने से हिस्से की धूप भी मिलेगी
हक छीनकर के पाना अधिकार जिन्दगी है

गुजरो जिधर से यारो बन के सुमन ही गुजरो
कोई भी कह सके ना लाचार जिन्दगी है

26 comments:

निर्मला कपिला said...

इन्सानियत की कीमत ईमान की भी कीमत
हालात ऐसे लगते व्यापार जिन्दगी है
और गुज़रो जिधर से सुमन-=--- बहुत कमाल की पँक्तियाँ हैं । पूरी कविता आज की जिन्दगी का सच ब्याँ करती सी हैं बधाई आपको इस सुन्दर रचना के लिये।

अरूण साथी said...

सभी पंक्तियों को पढ़ने के बात मन में वाह वाह निकला।
आपके लिए सिर्फ वाह वाह....

विनोद कुमार पांडेय said...

इन्सानियत की कीमत ईमान की भी कीमत
हालात ऐसे लगते व्यापार जिन्दगी है

duniya ka ek aapne gazal me piroya hai bahut badhiya lagi..dhanywaad suman ji

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन!

Kusum Thakur said...

"संधर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी है
काँटों सेज कहकर स्वीकार जिन्दगी है"

वाह श्यामल जी बहुत खूब .


काँटों की सेज देखी , फूलों की सेज देखी
संघर्ष भी लगे तो , अपना न हो फ़साना

डॉ. मनोज मिश्र said...

संधर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी है
काँटों सेज कहकर स्वीकार जिन्दगी है..
khoobsoorat laine.

पी.सी.गोदियाल said...

संधर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी है
काँटों सेज कहकर स्वीकार जिन्दगी है
बहुत सुन्दर श्यामल जी !

guddo said...

श्यामल जी
सदा सुखी रहो
गुजरो जिधर से खुशबु बन के सुमन के गुजरो
कोई भी कह सके ना लाचार जिंदगी है
वाह क्या दर्द भरे शब्द हैं इस गज़ल में
आपकी अंतिम शेर में बहुत ही जज्बात भरा हुआ है
और ऐसा लगता है कि आपने जी कर लिखा है इस गज़ल को
इतनी पसंद आयी पढते पढते अश्रुधारा बह निकली कृपया इस गज़ल को मेरी ऑरकुट भेज देवें
आशीर्वाद के साथ गुड्डों दादी चिकागो से

वन्दना said...

गुजरो जिधर से खुशबू बन के सुमन की गुजरो
कोई भी कह सके ना लाचार जिन्दगी है।।

waah ..........bahut sundar baat kahi........yun to zindagi har pal ek jung hai magar jiyo to aise ki sabki yaadon mein bas jao.

SACCHAI said...

गुजरो जिधर से खुशबू बन के सुमन की गुजरो
कोई भी कह सके ना लाचार जिन्दगी है।।

bahut hi badhiya rachANA ....badhai "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

मनोज कुमार said...

इस ग़ज़ल को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठा।

रश्मि प्रभा... said...

waah..bahut hi badhiyaa

Rajat Narula said...

इन्सानियत की कीमत ईमान की भी कीमत
हालात ऐसे लगते व्यापार जिन्दगी है


bahut umda bhav aur sarvotam rachna hai....

संजय भास्कर said...

वाह श्यामल जी बहुत खूब .

वन्दना अवस्थी दुबे said...

गुजरो जिधर से खुशबू बन के सुमन की गुजरो
कोई भी कह सके ना लाचार जिन्दगी है।।
क्या बात है श्यामल जी. बहुत खूब. गणतंत्र दिवस मुबारक हो.

डॉ टी एस दराल said...

इन्सानियत की कीमत ईमान की भी कीमत
हालात ऐसे लगते व्यापार जिन्दगी है

हालात तो कुछ ऐसे ही हैं।
अच्छी रचना।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना लगी.
आप को गणतंत्र दिवस की मंगलमय कामना
धन्यवाद

चन्द्र कुमार सोनी said...

happy republic day.
bahut badhiyaa likhaa.
thanks.
www.chanderksoni.blogspot.com

shama said...

संधर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी है
काँटों का सेज कहकर स्वीकार जिन्दगी है

मिलता सुकूँ हवा से जो तन पे हो पसीना
भूखे की जैसे रोटी अभिसार जिन्दगी है
Waah!
Gantantr diwas kee dheron shubhkamnayen!

श्यामल सुमन said...

आप सब के प्रति धन्यवाद सहित विनम्र आभार प्रेषित है।

अब फिर तीन फरवरी के बाद मुलाकात होगी नेट पर - तब तक अलविदा।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman. blogspot. com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सही पकड़ा है कवि ने जिन्दगी को!

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

गणतन्त्र-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

योगेश स्वप्न said...

charon taraf apni khushbu bikherta ek ek sher, behatareen.sumanji.

Apanatva said...

har ek panktee me vajan hai...
bahut sunder rachana............
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.......

Babli said...

बहुत सुन्दर रचना ! आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

रंजना said...

WAAH !!! WAAH !!! WAAH !!! LAJAWAAB BHAI JI, LAJAWAAB !!! KYA LIKHA HAI AAPNE...WAAH !!!

चन्द्र कुमार सोनी said...

excellent.
thanks.
www.chanderksoni.blogspot.com

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