बेबस है जिन्दगी और मदहोश है ज़माना
इक ओर बहते आंसू इक ओर है तराना
लौ थरथरा रही है बस तेल की कमी से
उसपर हवा के झोंके है दीप को बचाना
मन्दिर को जोड़ते जो मस्जिद वही बनाते
मालिक है एक फिर भी जारी लहू बहाना
मजहब का नाम लेकर चलती यहाँ सियासत
रोटी बड़ी या मजहब हमको ज़रा बताना
मरने से पहले मरते सौ बार हम जहाँ में
चाहत बिना भी सच का पड़ता गला दबाना
अबतक नहीं सुने तो आगे भी न सुनोगे
मेरी कब्र पर पढ़ोगे वही मरसिया पुराना
होते हैं रंग कितने उपवन के हर सुमन के
है काम बागवां का हर पल उसे सजाना
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रचना में विस्तार
साहित्यिक बाजार में, अलग अलग हैं संत। जिनको आता कुछ नहीं, बनते अभी महंत।। साहित्यिक मैदान म...
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अन्ध-भक्ति है रोग
छुआछूत से कब हुआ, देश अपन ये मुक्त? जाति - भेद पहले बहुत, अब VIP युक्त।। धर्म सदा कर्तव्य ह...
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गन्दा फिर तालाब
क्या लेखन व्यापार है, भला रहे क्यों चीख? रोग छपासी इस कदर, गिरकर माँगे भीख।। झट से झु...
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मगर बेचना मत खुद्दारी
यूँ तो सबको है दुश्वारी एक तरफ मगर बेचना मत खुद्दारी एक तरफ जाति - धरम में बाँट रहे जो लोगों को वो करते सचमुच गद्दारी एक तरफ अक्सर लो...
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लेकिन बात कहाँ कम करते
मैं - मैं पहले अब हम करते लेकिन बात कहाँ कम करते गंगा - गंगा पहले अब तो गंगा, यमुना, जमजम करते विफल परीक्षा या दुर्घटना किसने देखा वो...
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विश्व की महान कलाकृतियाँ-
18 comments:
कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई
बेबस है जिंदगी और मदहोश है जमाना
इक ओर बहते आंसू इक ओर तराना
एक पंक्ति
आंधी ने रोशनी की हिमायत तो की बहुत,
लेकिन कोई चराग कभी जलने नहीं दिया,
मेरा घर तो जल गया पर शहर बच गया,
अबके भी दीए का साथ हवा ने नहीं दिया,
राजी था मै और मेरा दुश्मन भी सुलह पर,
कुछ दोस्तों ने हाथ उनसे मिलाने नहीं दिया
आपकी कविता में कड़वे सच ही सच हैं जो मन को छू लेने वाले
फिर आपने लिखा
रोटी बड़ी या महजब हमको जरा बताना
पहले दो टूक भर पेट खाना
वाह सुमन जी जिस परिस्थिति में आपने यह लिखा है काबिले तारीफ़ है ...!
लौ थरथरा रही है बस तेल की कमी से
उसपर हवा के झोंके है दीप को बचाना
बहुत खूब कहा! वाह!
लो थरथरा रही है बस तेल की कमी से
अब तक नहीं सुने तो आगे भी ना सुनोगे
पढ़ कर यही निकला
कुछ भी हो इस दुनिया में पर
मेरा अंतिम संस्कार आप ही करोगे
यूँ तो हम आयें है, पहली बार सुमन के दर पे,
गर इतना गज़ब लिखेंगे, क्यों बार बार न आना ?!
बहुत खूब! लिखते रहिये ..
मजहब का नाम लेकर चलती यहाँ सियासत
रोटी बड़ी या मजहब हमको ज़रा बताना
मरने से पहले मरते सौ बार हम जहाँ में
चाहत बिना भी सच का पड़ता गला दबाना
बहुत अच्छी लगी आपकी रचना। बधाई।
वाह...वाह...वाह...बहुत ही सुन्दर !!!
हर शेर झकझोरती और सीख देती हुई...
बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल कही है आपने भैया...
आनंद आ गया पढ़कर...
मन्दिर को जोड़ते जो मस्जिद वही बनाते
मालिक है एक फिर भी जारी लहू बहाना
Aah ! Kaash ye baat aam aadami samajh sake!
Behtareen gazal kahi hai aapne!
अबतक नहीं सुने तो आगे भी न सुनोगे
मेरी कब्र पर पढ़ोगे वही मरसिया पुराना
--
बहुत सही चित्रण!
--
शानदार गजल!
सामयिक और सार्थक पंक्तियां..बहुत बढ़िया
बड़ी सुन्दर रचना है, मन के भावों को छेड़ती।
बहुत अच्छा लिखा हैं आपने.
धन्यवाद.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM
बेबस है जिंदगी और मदहोश है ज़माना
इक ओर बहते आँसूं इक ओर है तराना
बहुत खूब
हमारा भी सुना था आपने दिले फ़साना
उतर नहीं क्या गमेदिल हो गया पुराना
मरने से पहले मरते सौ बार हम जहाँ में
चाहत बिना भी सच का पड़ता गला दबाना
कितनी ठोस सच्ची बात
यूं मुझे ठोकर मार
आपके पैर में ना खरोंच आए
खुशियाँ ही खुशियाँ
आपके जीवन में आए
ओर मुझ बदनसीब की
छाया भी ना पहुँच पाए
जिंदगी हमारी हो गई पूरी
मिलने की आस है अधूरी
मजहब का नाम लेकर चलती यहाँ सियासत
रोटी बड़ी या मजहब हमको ज़रा बताना
Wonderful creation !
.
वाह बहुत सुन्दर.
bin aanshu ke trane kaise,,,
har trane ko sjata hai aansu..
joi bhool jae bhle par,,,
khusi aur gam dono mai aate hai aashu.
sabhi pankti ek se badh kar ek dhanyabaad
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