Wednesday, July 20, 2011

दिल तो है मिलने को आतुर

दिल तो है मिलने को आतुर जानती हो तुम सखे
है तड़प दोनो तरफ क्या मानती हो तुम सखे

है झिझक बस प्यार मे कि कब उठे पहला कदम
हो पहल उस प्यार की क्या सोचती हो तुम सखे

आँखों की गहराईयों में डूब कर मैं खो गया
प्यासी आँखों से मुझे नित खोजती हो तुम सखे

मैं छवि खुद की निहारूँ होतीं आँखे चार जब
पाश बनकर प्रेम का नित बाँधती हो तुम सखे

हो के व्याकुल नित चकोरी ढूँढती है चाँद को
इस तरह शायद सुमन को चाहती हो तुम सखे

17 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल...

kshama said...

Nihayat sundar gazal!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुन्दर भाव गज़ल के ..अच्छी प्रस्तुति

Amit Chandra said...

बहुत खुब। सुदंर गजल।

रजनीश तिवारी said...

bahut sundar gazal .

Sunil Kumar said...

बहुत खुब......

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर।

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) said...

भावों को कुशलता से अभिव्यक्त किया है. अति सुंदर.

vidhya said...

बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल..
आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

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Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर भावभिव्यक्ति...

SAJAN.AAWARA said...

Kamal ki gajal likhi hai apne.
Jai hind jai bharat

सुमन'मीत' said...

bahut hi pyara geet ..shyamal ji..

AVINASH KUMAR SINGH said...

GAZAL TO HOTI HI KHOOBSURAT HAI. AAPNE ISKI JATIYA KHOOBSURATI KO AUR CHATAKH BANAYA HAI. SHUBHECHHAYEN....AVINASH JSR

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 30/08/2011 को आपके दिल की बात नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

ana said...

आँखों की गहराईयों में डूब कर मैं खो गया
प्यासी आँखों से मुझे नित खोजती हो तुम सखे

बहुत ही खुबसूरत....दिल से बधाई स्‍वीकारें।

neela said...

दिल तो है मिलने को आतुर जानती हो तुम सखे
है तड़प दोनो तरफ क्या मानती हो तुम सखे


दिया लेकर, भरी बरसात में, उस पार जाना
उधर पानी, इधर है आग, दोनों से निभाना

नीला said...

मैं छवि खुद की निहारूँ होतीं आँखे चार जब
पाश बनकर प्रेम का नित बाँधती हो तुम सखे


गमो को दर पे छोड़ तुझे ही ढूँढता है दिल
इन्तजार करती हूँ दिन रात आ मुझे मिल

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