Saturday, December 17, 2011

जिसको खुद सहलाते हैं

संग तुम्हारे जो पल बीते, याद वही पल आते हैं
शायद वैसे पल फिर आए, मन को यह समझाते हैं

आँखों से बातें होतीं थीं, सुनते भी थे आँखों से
बेहोशी में होश की बातें, करके हम पछताते हैं

अनजाने राही थे फिर भी, न जाने क्यों मेल हुआ
समझ लिया जब इक दूजे को, दूर चले वो जाते हैं

शोर मची है दोनों दिल में, फिर से पास बुलाओ ना
बीच खड़ी ये जालिम दुनिया, गीत विरह के गाते हैं

गहरी आस मिलन की दिल में, सुमन संजोते रोज यहाँ
ना जाने इक टीस है फिर भी, जिसको खुद सहलाते हैं

22 comments:

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

अनजाने राही थे फिर भी, न जाने क्यों मेल हुआ
समझ लिया जब इक दूजे को, दूर चले वो जाते हैं
..behtarin panktiyan

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

mere blog par bhi aapka swagat hai

नीला said...

अनजाने राही थे फिर भी, न जाने क्यों मेल हुआ
समझ लिया जब इक दूजे को, दूर चले वो जाते हैं

बहुत गजब दार
बैठी हूँ यादों को पिरोय रुला के गया सपना तेरा

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आँखों से बातें होतीं थीं, सुनते भी थे आँखों से
बेहोशी में होश की बातें, करके हम पछताते हैं

खूबसूरत गज़ल

प्रवीण पाण्डेय said...

स्मृतियों का एक समुन्दर, तुमने यूँ ही रच डाला,
अब कौन किनारों को ढूढ़े, हम बीच पड़े उतराते हैं

Sunil Kumar said...

गहरी आस मिलन की दिल में, सुमन संजोते रोज यहाँ
ना जाने इक टीस है फिर भी, जिसको खुद सहलाते हैं
गजब का शेर , मुबारक हो ......

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

शोर मची है दोनों दिल में, फिर से पास बुलाओ ना
बीच खड़ी ये जालिम दुनिया, गीत विरह के गाते हैं

बहुत बढ़िया ग़ज़ल सर...
सादर.

गुड्डोदादी said...

श्यामल
आशीर्वाद

बहुत सुंदर कविता बधाई सवीकार करें
गा कर वीडियो भेजिये दादी को

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

गहरी आस मिलन की दिल में, सुमन संजोते रोज यहाँ
ना जाने इक टीस है फिर भी, जिसको खुद सहलाते हैं

khoobasoorat gazal

sushma 'आहुति' said...

बहुत सुंदर मन के भाव ...बेहतरीन ग़ज़ल....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 19-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

vandana said...

बहुत सुन्दर रचना ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया!

रश्मि प्रभा... said...

शोर मची है दोनों दिल में, फिर से पास बुलाओ ना
बीच खड़ी ये जालिम दुनिया, गीत विरह के गाते हैं
waah

सुमन'मीत' said...

बहुत सुन्दर गीत ....

संध्या शर्मा said...

खूबसूरत गज़ल...

नन्हों said...

गजब की गजल
बधाई स्वीकार करें लिखने की कलम ठंडी ना करें

हरी घास पर ओस की बूंदे बाढ़ की तरह थी
अकेला आकाश बहुत रोया होगा वियोग में

रंजना said...

आज तो रचना प्रेम रस से सराबोर है.....

बहुत बहुत सुन्दर..और क्या कहूँ...?

गुड्डोदादी said...

श्यामल
आशीर्वाद
गजल बहुत ही धमाकेदार
जिसे पढ़ कर

हरी घास पर ओस की बूंदे बाढ़ की तरह थी
अकेला आकाश बहुत रोया होगा वियोग में

***Punam*** said...

आँखों से बातें होतीं थीं, सुनते भी थे आँखों से
बेहोशी में होश की बातें, करके हम पछताते हैं

khoobsoorat ehsaas...lekin pachhtava.....
bilkul nahin....

गुड्डोदादी said...

.












Guddo Dadi

जिसको खुद सहलाते हैं

संग तुम्हारे जो पल बीते, याद वही पल आते हैं
शायद वैसे पल फिर आए, मन को यह समझाते हैं

आँखों से बातें होतीं थीं, सुनते भी थे आँखों से
बेहोशी में होश की बातें, करके हम पछताते हैं

अनजाने राही थे फिर भी, न जाने क्यों मेल हुआ
समझ लिया जब इक दूजे को, दूर चले वो जाते हैं

शोर मची है दोनों दिल में, फिर से पास बुलाओ ना
बीच खड़ी ये जालिम दुनिया, गीत विरह के गाते हैं

गहरी आस मिलन की दिल में, सुमन संजोते रोज यहाँ
ना जाने इक टीस है फिर भी, जिसको खुद सहलाते हैं

Posted by श्यामल सुमन at 7:16 PM 2 comments

Labels: ग़ज़ल

पसंद · · साझा करें · 18 दिसंबर को 00:42 बजे



Shyam Sunder, Ketan Anand, Sawai Suthar और 4 अन्य को यह पसंद है..

Guddo Dadi सुजाता जी धन्यवाद किसी का प्यार किसी का विछोड़ा समझो थोडा थोडा
18 दिसंबर को 04:31 बजे · पसंद.
Guddo Dadi अर्जन मीरचंदानी नन्हें भाई बहुत बहुत धन्यवाद
18 दिसंबर को 04:31 बजे · पसंद.

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शब्बो said...

सुभानअल्लाह क्या तूफानी लफज है गजल में

सर्द की रातों में दिल की रेत तप गई
मुआ चाँद भी बादलों की ओट छुप गया

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