Monday, June 4, 2012

दीवार

प्रायः हम सबने पढ़ा है,
सुना है श्रीमान
कि दीवारों के भी,
होते हैं कान

कभी कभी ऐसा क्यों
महसूसता हूँ कि
दीवारों की आँखें भी होतीं हैं

और  शायद इसलिए
दो भाईयों के बीच में,
खड़ी होने की वजह से
अक्सर दीवारें रोतीं हैं

7 comments:

संजय भास्कर said...

umda prastui ...abhar

प्रवीण पाण्डेय said...

दीवारों का दर्द कहाँ दिखायी पड़ता है।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

deewaar...dee war ..aankhein to nam hona hee hai..suman jee kahan kahan tak sochte hain aap wakai..yadi apni vyavastta se kuch chan chura sakein to mere blog per bhee aayiyega..badhayee ke sath

dr.mahendrag said...

दीवारें खुद को कोसती हैं,दीवारें रोती हैं ,
एक उम्दा भाव पूर्ण प्रस्तुति

Kusum Thakur said...

"दीवारें रोती हैं सही
मगर वह इतना है विवश
चाहकर न रोक सके
है यह उसकी तड़प "

अन्तरव्यथा..........

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह सुमन जी बहुत सुंदर दर्द आख़ि‍र दर्द है

vandana said...

यह संवेदनशीलता जरूरी है कि दीवारों के आंसू महसूस किये जा सकें ...बहुत बढ़िया

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