Thursday, August 30, 2012

सबको फुसलाता यहाँ

कौन किसको पूछता है कौन समझाता यहाँ
आईने का दोष देकर सच को भरमाता यहाँ

सात पीढ़ी से भी आगे धुन अरजने की लगी
मस्त अपने गीत में सब कौन सुन पाता यहाँ

सच कभी शायद वो सपने बन्द आँखों में दिखे
पर खुली आँखों का सपना सबको फुसलाता यहाँ

बह रहा जिसका पसीना खेत और खलिहान में
वक्त से पहले भला क्यूँ आज मर जाता यहाँ

चाँदनी भी कैद होकर रह गयी है आजकल
क्यूँ सुमन इस हाल में अब रोज पछताता यहाँ

8 comments:

Anupama Tripathi said...

सशक्त भाव हैं ...गहन अभिव्यक्ति है ....
आज का सामाजिक जीवन दर्शाती हुई ...
शुभकामनाएं

गुड्डोदादी said...

कौन किसको पूछता है कौन समझाता यहाँ
आईने का दोष देकर सच को भरमाता यहाँ
विहल वेदना

कौन किसी के आगे पीछे
हर कोई अपना सुख सोचे

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (01-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही प्रभावी रचना..

Sunil Kumar said...

बह रहा जिसका पसीना खेत और खलिहान में
वक्त से पहले भला क्यूँ आज मर जाता यहाँ
सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी.....

अजय कुमार said...

yathaarth aur saamyik

अजय कुमार said...

yathaarth aur saamyik

shashi purwar said...

कौन किसको पूछता है कौन समझाता यहाँ
आईने का दोष देकर सच को भरमाता यहाँ
.....namaskaar suman ji bahut sundar rachna hai gahare bhav liye huye .badhai aapko

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