Thursday, October 25, 2012

यही विश्वास बाकी है

किसी का ख्वाब मत तोड़ो, मेरी इतनी गुजारिश है
दिलों को दिल से जोड़ें हम, यही दिल की सिफारिश है
जहाँ पे ख्वाब टूटेंगे, क़यामत भी वहीं लाजिम
इधर दिल सूख जाते हैं, उधर नैनों से बारिश है

हकीकत से कोई उलझा, कोई उलझा बहाने में
बहुत कम जूझते सच से, लगे हैं आजमाने में
कहीं पर गाँव बिखरे हैं, कहीं परिवार टूटा है
दिलों को जोड़ने वाले, नहीं मिलते जमाने में

निराशा ही मिली अबतक, मगर कुछ आस बाकी है
जमीनें छिन रहीं हैं पर, अभी आकाश बाकी है
भले हँसकर या रो कर अब, हमे तो जागना होगा
उठेंगे हाथ मिलकर के, यही विश्वास बाकी है

पलट कर देख लें खुद को, नहीं फुरसत अभी मिलती
मुहब्बत बाँटने पर क्यों, यहाँ नफरत अभी मिलती
मसीहा ने ही मिलकर के, यहाँ विश्वास तोड़ा है
सुमन हों एक उपवन के, कहाँ फितरत अभी मिलती

15 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

उठेंगे हाथ मिलकर के, यही विश्वास बाकी है

यही विश्वास दिन ब दिन गाढ़ा होता जाता है।

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति ||

Manu Tyagi said...

आखिरी की चार लाइने तो दिल छू गयी

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सादर अभिवादन!
--
बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

प्रतिभा सक्सेना said...

'निराशा ही मिली अबतक, मगर कुछ आस बाकी है
जमीनें छिन रहीं हैं पर, अभी आकाश बाकी है'
बहुत सुन्दर ,मन को छूनेवाला !

Vinay Prajapati said...

Beautiful

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Virendra Kumar Sharma said...

यही विश्वास बाकी है

किसी का ख्वाब मत तोड़ो, मेरी इतनी गुजारिश है
दिलों को दिल से जोड़ें हम, यही दिल की सिफारिश है
जहाँ पे ख्वाब टूटेंगे, क़यामत भी वहीं लाजिम
इधर दिल सूख जाते हैं, उधर नैनों से बारिश है

हकीकत से कोई उलझा, कोई उलझा बहाने में
बहुत कम जूझते सच से, लगे हैं आजमाने में
कहीं पर गाँव बिखरे हैं, कहीं परिवार टूटा है
दिलों को जोड़ने वाले, नहीं मिलते जमाने में

निराशा ही मिली अबतक, मगर कुछ आस बाकी है
जमीनें छिन रहीं हैं पर, अभी आकाश बाकी है
भले हँसकर या रो कर अब, हमे तो जागना होगा
उठेंगे हाथ मिलकर के, यही विश्वास बाकी है

पलट कर देख लें खुद को, नहीं फुरसत अभी मिलती
मुहब्बत बाँटने पर क्यों, यहाँ नफरत अभी मिलती
मसीहा ने ही मिलकर के, यहाँ विश्वास तोड़ा है
सुमन हों एक उपवन के, वही फितरत अभी मिलती

Posted by श्यामल सुमन at 8:05 PM
Labels: मुक्तक
सुमन जी श्यामल मुक्तक नहीं यह तो पूरा प्रबंध काव्य है दास्ताने हिन्द है .
मसीहा ने ही मिलकर के, यहाँ विश्वास तोड़ा है
सुमन हों एक उपवन के, वही फितरत अभी मिलती

sylanisinh said...

badhiya hai!
to read my Hindi poems, kindly visit:
http://mahanagarmemahakavi.wordpress.com/

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 03/11/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Onkar said...

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

Akash Mishra said...

किस किस पंक्ति की तारीफ करूँ , सभी लाजवाब हैं | और सबसे खास बात किसी दायरे में सिमटी हुई नहीं लगतीं |
बहुत अच्छा लगा पढकर

सादर

Rahul Ujjainkar said...

सुन्दर प्रस्तुति ||
कभी हमारे घर भी पधारीयेगा
हमारा पता है
http://rworld23.blogspot.com

सुमन कपूर 'मीत' said...

अति सुंदर ...

संगीता पुरी said...

विश्‍वास बाकी रहनी ही चाहिए ..
सुंदर और प्रेरक गीत

Saras said...

कहीं पर गाँव बिखरे हैं, कहीं परिवार टूटा है
दिलों को जोड़ने वाले, नहीं मिलते जमाने में.....सच्ची तस्वीर ...

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!