Tuesday, April 9, 2013

नए सपने भी पल रहे कितने

दिल में अरमान जल रहे कितने
नए सपने भी पल रहे कितने

देख गिरगिट ने खुदकुशी कर ली
रंग इन्सां बदल रहे कितने

यूँ तो अपनों के बीच रहते हम
फिर भी आँसू निकल रहे कितने

चाँद पाने की दिल में ख्वाहिश ले
चाँद जैसे बदल रहे कितने

हजारों दोस्त मिलेंगे सिर्फ कहने को
दुख के दिन में असल रहे कितने

मौत परिचय बताती जीवन का
कोई जी कर सफल रहे कितने

इस हकीकत से रू-ब-रू है सुमन
हाल बदले, ऊबल रहे कितने

25 comments:

संजय भास्‍कर said...

बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

Rajendra kumar said...

बहुत ही सुन्दर प्रभावी रचना,सादर आभार.
"जानिये: माइग्रेन के कारण और निवारण"

दिगम्बर नासवा said...

हजारों दोस्त मिलेंगे सिर्फ कहने को
दुख के दिन में असल रहे कितने

नमस्कार श्यामल सुमन जी ... दुबई में आप से मिल के बहुत अच्छा लगा .. वो शाम अपने यादगार कर दी ... आशा है आप कुशल से होंगे ...

अनूषा said...

रंग बदलते मित्र, व्यंग्य, केवल मृत्यु के बस का सफलता चित्र...
एक ही कविता की पंक्ति में बुने, विस्तृत विलग विचार कितने.

कभी कविता विचार के मनकों को बाँधने वाली डोर है,
और कभी अंतर्मन को झंझोड़कर बिखेरने वाली धार है.

बहुत संुदर रचना...

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
कृपया पधारें

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन विश्व होम्योपैथी दिवस और डॉ.सैम्यूल हानेमान - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत सुंदर रचना.
LATEST POSTसपना और तुम

ANULATA RAJ NAIR said...

बहुत बढ़िया ग़ज़ल....
सुन्दर एवं अर्थपूर्ण शेर..

सादर
अनु

yashoda Agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 13/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
नवसम्वत्सर-२०७० की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें!

प्रतिभा सक्सेना said...

'हजारों दोस्त मिलेंगे सिर्फ कहने को
दुख के दिन में असल रहे कितने'
- यही सच है!

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत ही बढ़ियाँ गजल...
:-)

प्रवीण पाण्डेय said...

हमने चाहा, भाव संयत रहें मन में,
सहें हम, वे मचल रहे कितने।

प्रवीण पाण्डेय said...

हमने चाहा, भाव संयत रहें मन में,
सहें हम, वे मचल रहे कितने।

प्रवीण पाण्डेय said...

हमने चाहा, भाव संयत रहें मन में,
सहें हम, वे मचल रहे कितने।

कविता रावत said...

बहुत सही ..
वक्त पर जो साथ दे वही अपना होता है ....

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

एक गिरगिट ने खुदकुशी कर ली
रंग इन्सां बदल रहे कितने..हर शेर उम्दा ..आनंद आ गया मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

Vinay said...

नव संवत्सर की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!!

रश्मि शर्मा said...

एक गिरगिट ने खुदकुशी कर ली
रंग इन्सां बदल रहे कितने...वाह..

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया




सादर

Onkar said...

वाह,बहुत खूब

Onkar said...

बहुत खूब

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर....बेहतरीन रचना
पधारें "आँसुओं के मोती"

sushmaa kumarri said...

संवेदनशील रचना अभिवयक्ति.....

Jyoti khare said...

वर्तमान के सच को व्यक्त करती
सार्थक गजल
बधाई

आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
jyoti-khare.blogspot.in
कहाँ खड़ा है आज का मजदूर------?

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