Tuesday, August 13, 2013

मातृत्व की भव्यता (27-07-2013)

माँ! तू ही हो...
कण्ठ देश का प्रथम स्फोट
शिशु मानव का मूलाश्रय
आत्म-पिपासा का पीयूष
ममत्व और स्नेह का प्रकृत कौषेय

माँ! तू ही हो...
निसर्ग मूल का अवदान
मानस विकास का पूर्व चत्वर
प्रेम और वात्सल्य का अक्षय निधान
स्वैरिता का शाश्वत आप्यायन

माँ! तू ही हो...
त्रिविध दुःखतापों का नीहार
मानव अभ्युदय का वीतिहोत्र
त्वरा शान्ति का सुस्थिर मेघपुष्प
ध्वान्तधरा का प्रत्यक हरिदश्व

माँ! तू ही हो...
सत्य-शिव-सुन्दर का एकल समाहार
चिन्ता कुण्ठाओं का सत्वर प्रत्यादेश
शैशव लिप्साओं का वियदाकाश
जीवन उपवन का धवल कमल
तेरा यह उर्ध्वप्रयाण है, माँ
ममत्व की अविरल धारा का पूर्ण विराम
मेदिनी से व्योम तक का एक शून्यत्व
कौन, क्यों, कहाँ की जिज्ञासा का पटाक्षेप
विकल वात्सल्य का ऐहिक अवसान
तेरा यह स्वर्गारोहन है माँ
शिक्षा के क्रान्तिबीजों का उद्वेलन
योगक्षेम के निर्वहन का हेतु
नीति और धर्म के सत्य का संकल्प
सुकृति द्वारा विजयवैजयन्ती का उत्तोलन
जाओ माँ तुम उच्चलोक
भेजो सुख शान्ति का शुभाशीष
त्रुटियों, भूलों को क्षमा करो
स्मृति सज्जित तेरी आकांक्षा
दृढ़ व्रत लेता हूँ, पूर्ण करूँ...

नोट - माँ के निधन के पश्चात बड़े भैया श्री नन्द किशोर झा द्वारा रचित कविता

4 comments:

गुड्डोदादी said...

"मातृत्व की भव्यता
माँ मनोरमा ममता मयी नत नम श्रद्धांजली
माँ! तू ही हो...
निसर्ग मूल का अवदान

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द में अश्रु छलक पड़े हैं, माँ की श्रद्धांजलि हेतु।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल बृहस्पतिवार (15-08-2013) को "जाग उठो हिन्दुस्तानी" (चर्चा मंच-अंकः1238) पर भी होगा!
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत अभिवयक्ति.....

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